!! कवितायें कृष्णा के लिए !!



साँवरे की इन अंखियों को देख
नीगोरी अँखियाँ भी भर आयी हैं
जाने क्यों अब तक हमने ये
अँखियाँ कहीं और लगाई हैं

इन कजरारी अंखियों में
सारी दुनिया ही तो समाई है.
फिर भी हमने क्यों अपनी
अलग एक दुनिया बसाई है.

ये ओंठ जैसे कह रहे हो
अब  जा मेरे पास
यूँ  ठोकरे खा
तेरा रिश्ता मुझसे खास

खास ही तो है वो पिता हैं हमारे
हमने अपने सम्बन्ध हैं बिसारे
पर वो अभी भी रिश्ते को निभाते
सदा हमारे लौटने की बाट निहारे.

आज जो ये पीड़ा हो रही दूरी की
वो किसी अपने के लिए ही होता है
दिल तब ही तड़पता है यूँ बेबस
जब गहरा रिश्ता कोई खोता है

मेरी तड़प बढ़ा रही ये तेरी आँखें
मुझे बुला रहे तेरे मासूम अधर
आत्मा बेचैन है लोटने को कान्हा
अब बता भी दे तेरे चरण हैं किधर


तेरी मर्जी है कान्हा ठुकराना या चरणों से लगाना

सुना है इस दुनिया से दूर
एक अलग दुनिया है तेरी
जहाँ दुःख है आँसू है
खुशियों से भरी दुनिया है तेरी

तेरी दुनिया इतनी खूबसूरत है
तो हम उससे इतने दूर क्यों हैं
तू आनंद का सागर
फिर हम इतने मजबूर क्यों हैं

मुझे पता है इसका जवाब
ये गलती भी हमने की है.
हम उसके भी काबिल नही
जितनी कान्हा ने दी है.

हमें थी चाहत एक
अलग दुनिया बनाने की
हमें हुई थी तमन्ना
बाप से अलग घर बसाने की.

औकात नही थी पर
चले थी अलग एक हस्ती बनाने को
पता ही नही था कि
माया खड़ी है हमारी हस्ती मिटाने को

खा-खा के माया के थपेड़े
जर्जर हो गया है ये दिल
अब तो दिल भी यही कहता
कन्हैया जल्दी से मुझे मिल

गलती का अह्सास हो गया
पर सुधारने की काबलियत मुझमे नही
जिस कारण तुझसे दूर हूँ इतनी
तू ही कर सकता उस गलती को सही.

जैसी भी हूँ तेरी ही हूँ
कही और नही मेरा ठिकाना
अब तेरी मर्जी है कान्हा
ठुकराना या चरणों से लगाना



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