अनेकों बद्ध जीवों की भीड़ में मै भी भटक रही थी अंतहीन सफ़र में .कृष्ण कृपा से एक शुद्ध भक्त की दिव्य वाणी ने अहसास दिलाया कि ये जिन्दगी आहार,निद्रा,भय,मैथुन से हटकर भी कुछ है.फिर लालसा जगी जानने कि क्या है जिन्दगी की मंजिल? क्या है वास्तविक सुख?कहाँ ये मिलता है?आनंद क्या है?आनंद किसके पास है.सब का उत्तर एक ही था "कृष्ण".
फिर कोशिश शुरू हुई अध्यात्मिक यात्रा को शुरू करने की.वो कोशिश अभी भी जारी है.कृष्ण और उनके भक्तों की कृपा हो तो शायद एक दिन शुरू हो जायेगी वो दिव्य यात्रा.
माँ प्रेमधारा पार्वती राठौर(Premdhara Parvati Rathor) के अध्यात्मिक कार्यक्रम(Meow 104 .8 ) ने मेरे सोचने की दिशा बदल दी.इस मानव जीवन की महत्ता और मंजिल दोनों का भान कराया.उन्होने तो असली पिता का पता बताया है.शब्दों में व्यक्त नही की जा सकती कि क्या दिव्य तोहफा उन्होंने ने दिया है मुझे और न जाने कितनी बद्ध आत्माओं को.
जैसी मेरी जिन्दगी में दिव्य,सुखद परिवर्त्तन आया मै चाहती हूँ औरों को भी वो आनंद मिले.यही वजह माँ प्रेमधारा के प्रवचन को लिपिबद्ध करने का.एक छोटा-सा प्रयास लोगों तक इस दिव्य वार्ता को पहुंचाने का.