Tuesday, June 14, 2016

Spiritual Q/A Program Arpan on 2nd Jan 2016 by Premdhara Parvati Rathor(102.6 FM)

कार्यक्रम अर्पण में आपके साथ हूँ मैं  पार्वती राठौर. 2016 आ चुका है. है न. नया साल प्रवेश कर चुका है और अपने नए संकल्प लिए होंगे कि हम इस साल ये करेंगे, वो करेंगे. मैं पूछना चाहती हूँ कि कार्यक्रम सुनते हुए आपको एक अरसा हो गया होगा. क्या आपने भक्ति करने का संकल्प लिया? अगर आपने भक्ति करने का संकल्प लिया है कि इस साल से हम एक लम्हा, एक क्षण भी भगवान् की याद के बगैर नही गुजारेंगे तो समझ लीजिये कि ये सबसे प्यारा और शुद्ध संकल्प है. भगवान् आपकी मदद करेंगे कि आपका ये संकल्प न केवल इस साल बल्कि हर आनेवाले साल में ये संकल्प रहे और पूरा भी हो. सदा-सर्वदा. खैर आपका संकल्प पूरा होगा ऐसी मुझे उम्मीद है. आईये फिलहाल लेते हैं कार्यक्रम ममे आज का पहला प्रश्न.

प्रश्न: मेरा सवाल ये है कि जैसे मैं एक house wife हूँ. मैं घर के सारे काम बहुत अच्छे से करती हूँ. बच्चों को बड़ों को सबको करती हूँ. लेकिन पूजा पाठ में मेरा कुछ ज्यादा ही ध्यान है. जैसे मेरी सास है. बहुत अच्छी है वे लेकिन जब मैं पूजा पाठ करती हूँ तो गलत सलत बोलती है कि अपने पाप धो रही है. बुरे कर्मों को धो रही है. पिछले जन्म में पता नही क्या पाप करके आयी थी उसको धो रही है. मेरे को इस बात से बहुत हे दुःख पहुँचता है. अब मैं ये चाहती हूँ कि इस बात का उनसे विरोध करूँ या ignore करूँ. क्योंकि मैं सोचती हूँ कि बड़ों अपमान करूँगी तो कितना पाप चढ़ेगा मुझे. मैं पूजा पाठ में ध्यान दूँ .लेकिन ये भी कहते हैं कि अन्याय को सहना भी नही चाहिए...


उत्तर प्रेमधारा माताजी द्वारा : :हाँ मुझे समझ आ गया. आपके अंदर बहुत क्रोध भरा हुआ है. इस बात को लेकर बहुत ही आपत्ति भरी हुई है. गुबार भरा पड़ा है. समय कम पड़ गया है लेकिन निकल नही पा रहा है. खैर देखिये. आपने कहा कि आपकी सास कहती हैं कि तुम पूजा पाठ कर रही हो, अपने कर्मों को धो रही हो और आपने कहा कि आप अपने बच्चों का, पति का सबका बहुत ख्याल रखती है. बहुत अच्छे से घर को संभालती हैं. बस पूजापाठ में मन थोडा ज्यादा लगता है जो कि आपकी सास पसंद नही करती हैं और वो आपको इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुना देती हैं कि तुम पाप-वाप धो रही हो. और आप पूछ रही है कि क्या मई उनको पलटकर जबाव दूं? बड़ों को अपमान करूँगी तो और पाप लग जाएगा?

देखिये मैं आपको बताती हूँ बहन कि यही बहुत बड़ी बात है कि बच्चों के देखभाल करते हुए, गृहस्थी का धर्म पालन करते हुए आप परम धर्म को अपने जीवन में स्थान दे रही हैं. परम धर्म क्या है? परम धर्म है  भगवान् के तरफ मुड़कर उनकी सेवा करना. परम धर्म है हर जीव का. स्त्री और पुरुष का नही. स्त्री और पुरुष ये भगवान् की नजर में कुछ नही होता. हम जीव है. यही हमारी मूल पहचान है. अब आपकी सासू माँ उनका भी कोई दोष नही है. अब उनकी उम्र हो चुकी है. वो बेचारी अपनी प्रवृत्ति की शिकार है. उनकी जो प्रवृत्ति है न कि बस घर में बालबच्चे बस उन्ही का ध्यान रखना चाहिए, भगवान् वगैरह का ध्यान रखने के लिए उम्र पडी, अभी से य क्या कर रही है. अभी तो खेलने-खाने की उम्र है. वो अपनी पड़ोसनों के साथ बैठ-बैठके या रिश्तेदारों से मिल मिलके उनकी सोच इसी रूप में ढल चुकी है. है न.

वो जब देखती है कि मैं तो पूजापाठ कर नही रही. मेरी तो उम्र हो गई. और ये मेरी बहू,ये पूजापाठ करने चली तो उनका ह्रदय बड़ा दुखित होता है. और वो अपने को समझाने का प्रयास करती हैं कि मुझे क्या जरूरत है पूजापाठ की. मैंने क्कोई पाप थोड़े न किया है. इसने पाप किया होगा इसलिए पूजापाठ कर रही है. अब उनका भी दोष नही है. वो बेचारी जानती ही नही है कुछ. ज्ञान ही नही है कि पूजापाठ हम यों करते हैं. भगवान् की तरफ मुड़ने का मतलब क्या है. भगवान् हमारे सुहृत हैं. उनसे हमारा एक बहुत बड़ा, बहुत मूल्यवान संबंध है.

कौन समझाएगा उन्हें? तुम समझा नही पाती हो तो वो वैसा कहेंगी ही. तो कोई बात नही. जैसे भगवान् समद्रष्टा है न. अच्छा-बुरा कुछ समझ नही आता भगवान् को. वे किसी के प्रति वैर नही करते. जो जैसा भाव पोषित करता है भगवान् उसे उसी भाव में प्रतिकार करते हैं. स्वीकार करते हैं. तुम भी वैसी हो जाओ. जैसे भगवान् वैसा भक्त. अगर वे ऐसा बोल रही हैं कि अपने पाप धोरही है तो तुम बिल्कुल mind मत करो. क्योंकि ये बात तो सच है कि हमने आज कलयुग में जन्म लिया. भगवान् कितनी बार आये इससे पहले हम उनके साथ वापस नही गए. उनके साथ वापस कहाँ गए? हम आज भी इस कलियुग में हैं और न जाने क्या-क्या देख रहे हैं. इस दुनिया में क्या पाप नही हो रहे हैं, सब देख रहे हैं. तो यानि हमने पाप किये तभी तो इस कलियुग की भयंकरता को देख रहे हैं. तो अगर वे कह रही हैं कि तुम अपने पापों को धो रही हो तो ये बात भी सच है कि भजन करने से पाप धुलते ही हैं. इसमें गलत क्या है.

यही सोचो कि सचमुच हम पाप करके आये हैं तभी तो आज हम भगवान् की सेवा में नही हैं. आज भी हम  दुनिया की सेवा में हैं. और भगवान् की सेवा के लिए अभी भी हमारे मन में इतना बड़ा संकल्प नही है. हमारी बुद्धि भ्रष्ट है. हमारा शरीर बीमारियों से छिदा पड़ा है.अनेकानेक बीमारीओं का गढ़ बना हुआ है ये शरीर. और जो माहौल है वो भक्ति के बिल्कुल प्रतिकूल है. सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ उपभोक्तावादी माहौल है. consumerism फैला हुआ है सब जगह. बस हर व्यक्ति हर जीवात्मा एक probable consumer है.  उससे कितना रुपया लेना है और उसे कैसे utilize करना है बस यही समाज में एकल दस्तूर चला हुआ है. स्वार्थ के लिए सबका इस्तेमाल होता है.

अब जब ऐसे माहौल में हम रह रहें हैं तो इसका मललब यही है न भाई कि इतने भयंकर माहौल में भजन की तरफ मुड़ना, भगवान् की तरफ मुड़ना बड़ा ही दुष्कर है. बहुत ख़ुशी की बात है कि आप मुड़ गई. और हमने जो पाप किये हैं पिछले जन्मों में जिनकी वजह से हमें इतना कुछ देखना पड़ रहा है और शरीर को इतनी बीमारियाँ सहनी पद रही हैं तो भजन करने से वे पाप कट रहे हैं इसमें तो कोई शक ही नही है. तो आपकी जो सासू माँ है वे कहीं न कहीं से सत्य भी बोल रही हैं. आपने बहुत पाप नही किये हैं ऐसा क्यों सोचती हैं? अप अगर सोचेंगी कि अपने बहुत पाप किये हैं तो आपके ह्रदय में दीनता आएगी न. हाँ प्रभु मेरे जैसा अधम कोई नही है.

देखिये नरोत्तम दास ठाकुर महाशय जो कि भगवान् के आवेशावतार हैं. भगवान् के बहुत बड़े भक्त हैं, भक्ति की राह दिखाए वे कह रहे हैं कि प्रभु मुझ जैसा अधम कोई नही है. मुझ जैसा अधम कोई नही है. प्रभु आपका नाम पतितपावन है मगर मैं इतना अधम हूँ कि आपका नाम लोग नरोत्तम पावन बोलने लगेंगे. यानि कि पतित भी इतना अधम क्या होगा जितना मैं हूँ. वो परम भक्त, इतने बड़े भक्त ऐसा कह रहे हैं तो इससे क्या होता है. दीनता का प्रकटीकरण होता है, दैन्यता आती है. दीनता के बगैर तो हम भक्ति में कदम रख ही नही सकते.

तो जब भी आपकी सास बोले तो आपकी आँखों में आँसू आने चाहिए कि सच में प्रभु इतने पाप किये हैं कि पहले आपकी तरफ मुड़ ही न सकी. अब आपकी तरफ मुड़ भी रही हूँ तो भी मेरे कदम कितने लड़खड़ा के चल रहे हैं. अपने क़दमों में मैं शक्ति ला ही नही पा रही हूँ आप तक आने की. ये सब सोचिये. जब आप इस तरीके से सोचेंगी तो भक्ति में और जान आयेगी. गुस्सा करना छोड़ दीजिये. गुस्सा मत कीजिये.
*****************************************************

प्रश्न: आपका ये प्रोग्राम बहुत ही ज्ञानवर्धक है. कृपया आत्मज्ञान के विषय में बताएं. आत्मा जीव को कैसे ये अहसास कराती है कि मैं आत्मा हूँ?
उत्तर प्रेमधारा माताजी द्वारा : देखिये आत्मा और जीव एक ही तो है. आप ही तो आत्मा है. आपको ही ये समझना है कि आप आत्मा है. ये कोई दूसरा आ करके जीव को नही बतानेवाला कि आप आत्मा हैं. आपको समझना है कि मैं आत्मा हूँ. अब आप अपने आप को ध्यान से देखो, ध्यान से देखों. हम जब ये कहते हैं कि ये मेरा हाथ है. तो मैं कौन हूँ? क्या मैं हाथ हूँ? मैं हाथ नही हूँ इसीलिए तो कहा कि मेरा हाथ हैं. तो मैं इस शरीर में क्या हूँ? क्या मैं आँख हूँ? नही मैं आँख भी नही हूँ. मेरी आँख है. तो इस शरीर में मैं क्या हूँ? जिससे मैं बोल रहा हूँ वो जिह्वा मैं हूँ? नही वो मेरी जिह्वा है. हाँ. मेरा पैर है, मेरी गर्दन है. मेरी गर्दन में बहुत दर्द हो रहा है, मेरे बाल जो हैं वे रूखे-सूखे हैं. मेरा ये वो है. मेरा पैर जो है चल नही पा रहा है. ये सब आपके हैं तो आप कौन हैं? ये बताईये आप मुझे. पहले सोचिये इस बारे में. अगर हाथ आप नही हैं तो आप कौन हैं? अगर ये शरीर का हर अंग आपका है  और आप ये शरीर नही है. तभी तो आप ये बोल रहे हैं कि ये मेरा है. ये मैं कौन हूँ?

तो उत्तर इसका भगवान् ने भगवद्गीता गीता में बहुत ही सुंदर तरीके से दिया है. द्वितीय अध्याय में. आप पढ़कर देखिये. भगवान् कह रहे हैं कि अर्जुन तुम आत्मा हो. हर देहधारी देह को धारण करता है. उसे ही जीव कहते हैं. वही आत्मा है उसका एक नाम जीव है. जैसे शरीर का एक नाम देह है, शरीर का एक नाम body है इसीप्रकार से. तो आत्मा कभी भी इस शरीर को यह नही बताता कि मैं आत्मा हूँ. यानि कि तुम आत्मा हो और तुम्हे ये महसूस करना पड़ेगा अपने आसपास की घटनाओं को देखकर. अगर मान लीजिये किसी का हाथ कट गया तो भी वह कहता है कि मैं जिन्दा हूँ. हाथ ही तो कटा है पर वो व्यक्ति तो अभी भी है. अगर पूरा शरीर है पर उसमें से वो चेतन शक्ति जो शरीर को occupy कर रहा था वो चला गया. शरीर अभी पूरा है as it is. पड़ा हुआ है. कोई कहता है वह जिन्दा था क्योंकि दिल धकड़ता था पर दिल तो अभी भी धड़काया जा सकता है मशीनों से. खून अबभी भी संचरण कराया जा सकता है, साँसें अभी भी मशीनों से दिलायी जा सकती है. तो क्या आदमी जिन्दा हो जायेगा. नही. क्यों? क्योंकि देही चला गया. वो देही कौन है? वही तो आप हैं. तो ये जो difference है उसे अच्छे से नोट करो, इसके बारे में सोचो.

हमारे परिवार में कितनों की ही मृत्यु हो चुकी है. इअसा नही है कि हमारे परिवार में मृत्यु नही हुई. दादा-परदादा न जाने इतने लोगों की मृत्यु हुई. तो वे लोग कौन थे? मृत्यु क्या होती है? देही जब देह को त्याग करके अन्य देह धारण करने चल देता है अपने कर्मानुसार उसे ही मृत्यु कहते हैं और तो कोई बड़ी चीज नही है मृत्यु. जितनी समय अवधि मिली थी, साँसे मिली थी, पूरी की और अपने next destination के लिए चल दिया. अगली मंजिल की तरफ, अगले देह की तरफ. पहले ये तो समझो कि तुम आत्मा हो. और इस शरीर में इतने लिप्त हो गए हो सदियों से, अनेकानेक जन्मों से शरीर के प्रति इतना ज्यादा आसक्त हो गए हो कि खुद को शरीर समझने लगे. जैसेकि कोई विदेशी गाड़ी ले आये और गाडी को drive करे और अचानक कोई उसकी गाडी में धक्का मार दे, scratch लग जाए तो वो एकदम चिल्लाएगा जैसे scratch गाडी पर नही उसकी आत्मा पर, उसके शरीर पर लग गया ह. वो घायल हो गया हो. क्योंकि वो गाडी से पाने आप को एकाकार समझने लगा.

ऐसे ही हमलोगों की अवस्था है. हम इस शरीर से अपने आप को उतना ज्यादा पहचानते हैं न कि हम शरीर हैं ये समझते हैं. मैं बूढा हो रहा हूँ ये कहते हैं. देखों न मेरा पेट निकल आया है. तुम पेट नही हो, तुम बूढ़े नही हो. तुम तो सदियों से ऐसे थे, ऐसे ही रहोगे लेकिन ये शरीर है जो changes का शिकार होता है, जिनमे बदलाव आते हैं. बड़े ध्यान से सोचोगे तो तुम्हे तुम्हारे प्रश्नों का स्वयं उत्तर मिल जाएगा. सिर्फ सोच से ही ये पता चलेगा कि तुम आत्मा हो. है न. मनन से पता चलेगा. आज की भागती दौड़ती जिन्दगी में क्या किसी के पास इतना समय है कि वो इस बात का मनन कर सके? अगर वो कर पाया तो बहुत बड़े सत्य की तरफ वो पहुँच जाएगा. याद रखिये.

****************************************


Spiritual Program Samarpan on 2nd Jan 2016 by Premdhara Parvati Rathor(102.6 FM)

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मैं प्रेमधारा. नमस्कार. सन 2016 बिल्कुल अब आपके पास पहुँच चुका है. आप 2016 में पहुँच चुके हैं. यानि नया साल शुरू हो चुका है और नए साल के नए सपने, नयी उम्मीदें आप देख रहे हैं. और नए-नए सुख के बारे में अनुसंधान भी शायद शुरू हो चुका होगा कई लोगों का. सब सुख चाहते हैं. वैसे मैं भी यही चाहूँगी कि आप नए साल में सुखी रहें.

लेकिन अगर कोई व्यक्ति भगवान से ये कहे कि हे प्रभु आप केवल मुझे दुःख दें. सुख का लेश मात्र भी मुझे न दें. तो ऐसी प्रार्थना सुनने में कुछ अटपटी-सी लगती है. क्योंकि ऐसी प्रार्थना कोई कर ही नही सकता. हर व्यक्ति भगवान् की तरफ मुड़ता ही इसलिए है कि उसे सुख चाहिए. अगर उसे ये पता चले कि भगवान् से दुःख माँगे या माँगना होगा तो क्कोई भी व्यक्ति भगवान् की तरफ मुड़ें न.

लेकिन वो भक्त जो भगवान् का एकबार आस्वादन प्राप्त करते हैं. उनका माधुर्य, उनके नाम का आस्वादन, उनके रूप, ऊनके गुण, उनकी लीलाओं का आस्वादन. और उसमें जब वे डूबने लगते हैं. आनंद के हिलोरें उनके ह्रदय में उठने लगते हैं तब वे कहते हैं कि प्रभु मुझ पर इतनी विपदायें आयें कि आप मिले. ये विपदायें हमेशा आती रहें ताकि आप कहीं न जाएँ. और ऐसा ही कुछ कह रही हैं हमारी प्यारी कुंती महारानी जो कि भगवान् की सुन्दर तरीके से स्तुति कर रही हैं. और हम अपना विशेष कार्यक्रम भी कुंती देवी की स्तुतियों पर प्रस्तुत कर रहे हैं. तो एक और बहुत सुंदर स्तुति कर रही हैं :

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो। 
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥ 
जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्। 
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वां अकिञ्चनगोचरम्॥

अर्थात्
हे जगन्नाथ हमारा सारी अवस्थाओं में मुसीबतों से ही सामना हो. मुसीबत से हम आपका दर्शन कर पातें हैं क्योंकि आपका दर्शन भव का रोग दूर कर देता है और कह रही हैं कि सतकुल में जन्म, सम्पत, विद्या और सौभाग्य के गर्व से जो मत्त व्यक्ति लोग हैं वे आपको कंगालों के भगवान् बोलते हुए कभी भी आपके बारे में सोच नही पाते. वे आपको कंगालों का भगवान् बोलकर कभी भी आपके बारे में सोचने के लिए नही बैठ पाते. 

बहुत बड़ी बात कह रही हैं कुंती जी. भगवान् जोकि भक्तों का बहुत ही ज्यादा ध्यान रखते हैं. भक्तों के प्रति वात्सल्य से भरपूर हैं. है न. तो भगवान् का जो वात्सल्य है, उस गुण को अनुभव करके कुंती महारानी कह रही हैं कि प्रभु मुझ पर सदा सर्वदा दुःख टूटते रहे क्योंकि जो भगवद भक्त चूडामणिगण हैं न वो विपदा हो या सम्पदा हो. मुसीबत या सुख हो दोनों ही स्थिति में समान रहते हैं और भगवन के चरणों में मन रखते हुए हर कदम पर परमानंद का आस्वादन करते हैं. सम्पद सुख की छलना हो या विपद दुःख की विभीषिका हो भक्त के ह्रदय को कुछ भी स्पर्श नही कर पाता. किन्तु में विपदा में उनका अधिक आग्रह होता है क्योंकि भगवान् को विपदभंजन भी कहते हैं. किसी पर अगर विपदा आयी, दुःख टूटे तो भगवान् उस दुःख का निवारण करने के लिए आ जाते हैं. अगर विपदा ही नही आयी तो विपदभंजन के रूप में हम उन्हें पा नही सकते. उनका दर्शन नही कर सकते.

तो विपदा में ही उनकी कृपा का पूर्ण प्रकाश होता है. और कुंती देवी पर क्या विपदाएं नही आयी. कितनी विपदायें आयी. उनके पति चल बसे, उनका राज्य उनके हाथ से चला गया, भीम को बचपन में ही दुर्योधन ने मारना चाहा, उनकी बहू द्रौपदी के साथ बुरा आचरण किया गया, उनके राज्य को छीन लिया गया, चालाकी से युधिष्ठिर महाराज को द्युत क्रीडा में हरा दिया गया, महाभारत का युद्ध हुआ, कितनी सारी मुसीबतें आयी उन पर, लाक्षागृह में उनको षड्यंत्र के साथ भेजा और उनको जलाकर मारने की कोशिश की गई.  तो विपदा-विपदा ही आती रही. और अंततः अश्वत्थामा का जो ब्रह्मास्त्र था उसने उत्तरा के गर्भ पर आक्रमण किया ताकि पांडवों का सर्वस्व नाश हो जाए. मूल नाश हो जाए. तो भगवान् ने वहाँ भी उनकी रक्षा की. तो हर कदम पर, बारबार भगवान् ने जो है कुंती महारानी और उनके परिवार की रक्षा की. इसीलिए अब वे महसूस कर रही हैं कि ये विपदा है, ये जो मुसीबत है न वो हमारा परम बंधु है. परम बंधु.

दुनिया भगवान् के चरणों में जाती है कि हे भगवान् मुझे मुसीबतों से छुटकारा दिला दो. पर यहाँ कुंती जी कह रही हैं कि प्रभु विपदा के निवारण की आशा मैं नहीं करती हूँ. विपदा ही बारबार हर कदम पर मुझे मिले. क्यों? क्योंकि इसी से मैं दृढ रूप से आपके श्रीचरणों का आश्रय कर पाऊँगी. जीवन में जितनी बार विपदा आयी प्रभु हमें उतनी बार आपके दर्शन मिले. क्यों? क्योंकि आप तो विपदभंजन हैं. अपने चरणाश्रित व्यक्ति की विपदाओं को आपसे देखा ही नही जाता. इसलिए प्रभु आप अपने भक्तों को उनके दुखों से छुटकारा दिलाने के लिए स्वयं आकर उपस्थित हो जाते हो. तो इन दुखों के कारण ही हमें बारबार आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है.

कितनी बड़ी बात है! कह रहे हैं कि कितने ही प्रभु जो योगीन्द्र, मुनीद्रगण हैं वे भव दर्शन निवृत्ति करने के लिए कि  जैसे ही आपके दर्शन होंगे ये भव  का जो आना-जाना है उससे निवृत्ति मिल जायेगी. उससे छुटकारा मिल जाएगा. तो वो बहुत समय तक. अनेकानेक वर्षों तक आपकी तपस्या करते हैं और आपके दर्शन लाभ की चेष्टा करते हैं. परन्तु न देखिये न प्रभु मेरा सौभाग्य कितना बड़ा है. मैं तो बस मुसीबत में पडी और बिना किसी साधन भजन के आपके दर्शन कर पायी. इसलिए इस विपदा से बड़ा मेरा बंधु भला कौन हो सकता है. कितनी बड़ी बात कह रही हैं कुंती महरानी जिस पर हम चर्चा करेंगे. सुनते रहिये समर्पण.

........................................................
कार्यक्रम समर्पण में हम बहुत सुंदर श्लोक ले रहे हैं जिसमें कुंती महारानी बहुत सुंदर तरीके से बता रही हैं कि विपदा जो है कितना बड़ा सौभाग्य है किसी पर. दुखों की अनुभूति से ही ईश्वर के साक्षात्कार के लिए रास्ते निकलते हैं. है न. उनको जानने के लिए दुनिया प्रयास करती है. वरना अगर दुःख न मिले, आदमी सुखों में लिप्त बैठा रहे तो भगवान् का नाम सुनकर वो हँसेगा. कहेगा कि भगवान् मुझे क्या सुखी करेंगे. मई तो already बहुत सुखी हूँ. है न.  ये बात जानती हैं कुंती जी इसीलिए कह रही हैं कि मुझ पर मुसीबतें आये.

आगे वे कह रही हैं कि प्रभु सतकुल में जन्म, संपत्त, विद्या और सौभाग्य अगर किसी के पास ये सब हो. यानि अगर उसने अच्छे कुल में जन्म लिया हो, उसके पास बहुत पैसा हो, पैसा हो और विद्या भी हो यानि ज्ञान भी हो. साथ ही सौभाग्यशाली भी. जिस काम में हाथ डालता हो उसी में उसे सफलता मिल जाए. है न. तो ऐसा व्यक्ति क्या भगवान् को कभी याद करेगा. नही. क्योंकि उसके अंदर इतना घमंड आ जाएगा कि वो सोचेगा कि अरे ये भगवान् तो कंगालों के भगवान् हैं. हम तो अमीर हैं. हमारे पास सबकुछ है. हमें क्या जरूरत है इन्हें याद करने की. ऐसा वो सोचेगा.

इसीलिए कह रही हैं कि प्रभु ये सम्पत्ति है न वो महाशत्रु है, महाशत्रु क्योंकि जिसके पास बहुत सम्पत्ति होती है न वो उसमे इतना आसक्त हो जाता है कि आपकी उसे याद नही रहती, आपको वो भूल जाता है. सतकुल में जन्म हो या राज्य आदि का ऐश्वर्य हो या बहुत सारे शास्त्रों का ज्ञान हो या बहुत पढालिखा हो. असीम सौभाग्य के अभिमान में आपकी बात किसी के मन में नन्ही रह पाती. आप तो कंगालों के धन हैं प्रभु. कंगालों के. अभिमानी लोग आपको कहाँ पायेंगे. तू कहती हैं कुंती जी कि हमारे जो बच्चें हैं पाँचों पांडव इनके पास अगर सम्पत्ति रहती तो दुर्योधन आदि की तरह आपको ये भूल जाते. पूरी तरह से आपको भूल जाते प्रभु.

दुर्योधन का हाल ऐसा क्यों हुआ क्योंकि उनके पास सम्पत्ति थी खूब सारी, खूब मित्र थे उनके. वो तकरीबन राजा के समान ही सबसे व्यवहार करते थे. आनेवाले समय के राजा वही बननेवाले थे. उन्ही की चलती थी अपने पिता पर भी. एक तरीके से वही सब कुछ थे. राजा भी वही थे. तो इस मदान्धता में, इस अभिमान में सामने भगवान् को देखकर भी वे उनकी तरफ नही मुड़े. भगवान् को देख रहे हैं लेकिन मुड़े नही. भगवान् को अपना विश्वरूप दिखाना पड़ा. अपना ऐश्वर्य दिखाना पड़ा क्योंकि जब भगवान् वहाँ आये संधि का प्रस्ताव ले करके तो दुर्योधन ने सोचा कि क्यों न इन्हें बंदी बना लिया जाए. फिर तो जो पांडव हैं वे अपने आप हार जायेंगे.भगवान् को बंदी बनाने चल दिया दुर्योधन लेकिन भगवान् ने अपना जो रूप दिखाया उससे वो भयभीत हो गया परन्तु तब भी ये बात समझ नही आई कि ये ईश्वर हैं. इनकी बात पर मुझे अमल करना चाहिए. इनकी बात ध्यान से सुननी चाहिए. और तो और विदुर जी ने उन्हें सही सलाह दी तो उसे भी अनसुनी कर दी. उल्टा सही सलाह देनेवाले विदुर जी को दासीपुत्र कहके घर से बाहर निकाल दिया.

तो इसलिए कह रहे हैं कि प्रभु आप तो जगतगुरु है. भगवान् जगत को शिक्षा देते हैं. कैसे शिक्षा देते हैं? दुखों को देकर भी शिक्षा दी जाती है. हाँ. जैसे महाभारत  में जब युधिष्ठिर जी ने पाशा क्रीड़ा खेली तो सबको शिक्षा दी कि ये पाशा क्रीडा, जुआ अगर कोई खेलेगा तो उसकी मति पर आघात होगा, उसका विवेक कार्य नही करेगा. उसके जीवन के सुख के सारे रास्ते बंद हो जायेंगे. उसे दर-दर भटकना पड़ेगा. तो भगवान् अपने ही भक्तों के द्वारा शिक्षा प्रसारित करते हैं. स्वयं अपने आचरण के द्वारा भी लोक शिक्षा प्रसारित करते हैं. तो भगवान् जगत के गुरु हैं और क्या कहा कि जैसे दृष्टिहीन जीव हैं न उनकी आँखों को खोल देना ही, रोशनी देना ही गुरु का काम है. दृष्टिहीन मतलब जो आध्यात्मिक पथ की ओर न देखता हो ऐसा.

इसीलिए कह रही हैं कुंती जी की आपने विपदा रुपी काजल दे करके अभिमान की अन्धता हमारी दूर कर दी और आपने हम शरणागतों के नयनों में रौशनी भर दी. अपने चरण के दर्शन से हमें कृतार्थ कर दिया. और हम भी भगवान् की इस भक्त वत्सलता को याद रखें. और याद रखें कि जब भगवान् की कोई शरणागति ले लेता है तब भगवान् उसकी रक्षा के लिए सदा-सर्वदा तत्पर रहते हैं. उस पर कभी कोई मुसीबत नही आ सकती.

और इसी विश्वास के साथ हम अपनी भक्ति करते रहें. इसी शुभकामना के साथ अब आपसे इजाजत चाहती है प्रेमधारा. नमस्कार.
********************************************************

Wednesday, May 7, 2014

आध्यात्मिक समस्याओं के शास्त्रोचित समाधान by Maa Premdhara(102.6 FM) on 5th Jan,2014

Spiritual Program ARPAN On 5th Jan, 2014(102.6 FM)
प्रस्तुत है कार्यक्रम अर्पण.भक्ति की राह मे अाते समय कही आपके कदम डगमगा न जाए.अगर ऐसा हो रहा है तो कृपया आप फ़ोन घुमाइए और हमसे प्रश्न पूछ डालिए.

Friday, January 24, 2014

आध्यात्मिक समस्याओं के शास्त्रोचित समाधान by Maa Premdhara(102.6 FM) on 4th Jan,2014

Spiritual Program ARPAN On 4th Jan, 2014(102.6 FM)
प्रस्तुत है कार्यक्रम अर्पण में आप सबका स्वागत है.मै हूँ आपके साथ पार्वती राठौर.नमस्कार.कैसे हैं आप?आप सबको नया साल बाहुत-बहुत मुबारक हो.नए साल में आप जमकर भक्ति करे और भगवान की तरफ अग्रसर हो खूब मजबूती से.इस प्रयास में अगर आपको दिक्कत हो,कोई कठिनाई हो या कोई जिज्ञासा हो तो कृपया आप हमसे प्रश्न करे.हम आपके प्रश्न का समाधान करने का प्रयास करेंगे.तो आईये सुनते हैं कार्यक्रम का पहला प्रश्न:
प्रश्न: मेरा प्रश्न है कि ईश्वर की सेवा कैसे कर सकते हैं?
समाधान: देखिये ईश्वर की सेवा कैसे कर सकते हैं,ये तो बहुत अच्छा प्रश्न है.लेकिन ईश्वर की सेवा की इच्छा उत्पन्न होना ये सबसे important हैं.सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है .ईश्वर की सेवा करने की इच्छा ही तो नही उत्पन्न होती.हम ईश्वर को बहुत बड़ा ऐश्वर्यशाली समझ लेते हैं जो कि वो हैं भी.हम सोचते हैं कि हमारे खिलाने से हमारा दाता कहाँ संतुष्ट होगा.वो तो हमारा दाता है.हम भला उए कहाँ से संतुष्ट कर सकते हैं.

तो ऐसे-ऐसे ख्याल हमारे मन में आ जाते हैं और सेवा भाव बहुत दूर छिटक के चला जाता है.तो मै बहुत प्रसन्न हूँ कि आप ये  पूछ रही हैं कि ईश्वर की सेवा कैसे की जा सकती है.देखिये शुरुआत करिए हरिनाम से.भगवान का नाम लेती रहिये.आपकी जिह्वा जब भगवान के नाम में रत हो जायेगी तो भगवान् आपके अन्दर ऐसे संस्कार डाल देंगे.ऐसी प्रेरणा डाल देंगे जिससे आप उनकी और ज्यादा सेवा कर पायेंगे.

तो शुरुआत कीजिये हरिनाम से.भगवान के नाम से.बाकी सब अपने आप हो जाएगा.

प्रश्न: भगवान का दिन में चिंतन किया जाए औ रात में भगवान की भक्ति की जाए.इससे भगवान खुश होंगे क्या?रात की भक्ति एकान्तिक भक्ति भी है.इसे न कोई सुननेवाला न कहनेवाला.शांति से भक्ति की जाए.या फिर माताजी अआप बताईये कि भक्ति दिन में की जाये या रात में की जाए?
समाधान: देखिये ये जो समय है दिन और रात.ये हमारे लिए है.हम जैसे बद्ध जीवात्माओं के लिये है.भगवान के लिए तो क्या दिन और क्या रात.सब सामान है.मुख्य बाट है भगवान के प्रति अपने ह्रदय में भाव जागृत करना.अगर तुम्हारे मन में ऐसे सुन्दर-सुन्दर भाव भगववान के लिए उठाते हैं तो वही सबसे अच्छी बात है.
अगर वो दिन में उठते हैं तो उन्ही भावों को आप दृढ करिए,प्रबल करिए और आर आपको लगता है कि रात को बहुत अच्छे भाव उठते हैं भगवान के लिए तो उनमे डूब जाईये.है न.

तो ये मत सोचिये कि सुबह करूं,शाम करूं.रात करूँ दिन करूँ.अगर आपके घर की परिस्थिति ऐसी है कि आपके पति पसंद नही करते,आपी सास पसंद नही करती,कोई और पसंद नही करता आपके भक्तिमय कार्य को.तो प्रयास कीजिये कि उअसे छुपाकर किया जाए.क्या जरूरी है ऐलान करना.बिल्कुल जरूरी नही है.

प्रेम को तो यूं भी दिल में रखा जाता है.है न.
प्रश्न: गुरु बना के हो सकती है भक्ति या बिना बनाये भी हो सकती है?
समाधान: बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है आपने.गुरु बनाके भक्ति हो सकती है या बगैर गुरु के हो सकती है.देखिये ये गुरु शब्द की जगह अगर हम कहे मार्गदर्शक तो ज्यादा उचित रहेगा.ये गुरु शब्द बड़ा अजीब-सा शब्द हो गया है आजकल के जमाने में क्योंकि हर कोई बैठा हुआ है गुरु बनने को तैयार.हर कोई बुला रहा है-आओ,आओ मुझसे दीक्षा लो,मै तुमको पार उतार दूंगा.है न.ऐसे में कई बार इंसान फँस जाता है.समझ नही आता कि जिस जगह वह गया वह सही जगह है या नही.\\और वो बहुत बेचारा दुविधा में पड़ जाता है.

अगर मै ये कहूँ कि आपके जीवन में एक मार्गदर्शक हो जो स्वयं भक्ति करता हो और भक्ति का रसास्वादन उसे प्राप्त होता हो,वो इतना सक्षम हो कि आपको भी रसास्वादन करा पाए.आपको पग-पग पर दिशा निर्देश दे पाए कि इसतरह से चलो और ऐसे भक्ति करो.ऐसे मार्गदर्शक के आनुगत्य में भक्ति करना ज्यादा श्रेयस्कर है.यही कहूंगी.ऐसा मार्गदर्शक आपको मिल जाए,यही आप भगवान से प्रार्थना करिए.

प्रश्न: अवतार और भगवान में क्या अंतर होता है?
समाधान: अच्छा question है आपका अरविन्द कि अवतार और भगवान इ क्या अंतर होता है.भगवान जब किसी विशेष प्रयोजन के लिए और उस प्रयोजन के सन्दर्भ में एक निश्चित शक्ति से युक्त हो करके आते है.भगवान स्वयं आते हैं.भगवान स्वयं आने का अर्थ है कि जो भगवान का अंश है जो कि उस विशेष प्रयोजन के लिए आ रहा है तो वो भी तो स्वयं भगवान ही हो गया न.अंश है तो क्या.भगवान की पूरी शक्ति उनके अन्दर है.वो शक्ति प्रकटित नही करते हैं क्योंकि प्रयोजन बस उतना भर है कि उतनी ही शक्ति से काम चल जाएगा.

जैसे चन्द्रमा एक ही है न लेकिन विभिन्न दिनों में जब आप उस चन्द्रमा को देखते हो तो कभी छोटा,कभी और छोटा,बिलकुल पतला-सा नजर आता है .तो आप ये नही कह सकते कि पूर्णिमा का चाँद अलग है और ये पतला-सा चाँद अलग है.ये तो चाँद ही नही है.ये तो बेकार है.ऐसा नही कह सकते.

इसीप्रकार से भगवान विभिन्न प्रयोजनों के हिसाब से अपने अंश को भेजते हैं और वो प्रयोजन पूरा हो जाता है तो भगवान के अंश अपने धाम में चले जाते हैं.तो यही अवतार होता है.ऊपर से नीचे आना उस प्रयोजन कुछ भी हो सकता है.असुरों का संहार,भक्तों पर कृपा.कुछ भी हो सकता है प्रयोजन.

प्रश्न: जब हम भगवान का अंश हैं तो भगवान से दूर क्यों है और इतने कष्टों का सामना क्यों करना पड़ता है?
समाधान: बहुत अच्छा प्रश्न आपने पूछा.भगवान भी तो कहते हैं न भगवद्गीता में :

ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः ।

मनः षष्ठानीऽऽन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

बहुत सुन्दर बात भगवान ने कही है.कि भैया सारे जीव जो है न मेरे अंश हैं.लेकिन अपनी इन्द्रियों के विषयों में अपने मन को इस कदर डुबो दिया है कि वे इस भयंकर जगत में संघर्ष कर रहे हैं.हैं मेरे अंश पर मेरे पास आना नही चाहते.

आज अगर हम किसी को कहे कि सारे काम छोड़छाड़ दो और भगवान का तहे दिल से भजन करो और भजन के अलावा कुछ भी नही करो.सिर्फ भजन करो,भजन करो,भजन करो तो कितने ही लोग,कितने ही लोग इस बात का विरोध करेंगे.तर्क कुतर्क करेंगे.अरे भाई भगवान क्या तुम्हारे खाना खिला देंगे हमें. ये कर देंगे वो कर देंगे.अनेक प्रश्न करेंगे.लेकिन विश्वास किसी को नही होगा.अगर जब तक किया नही ,करके देखा नही तो फिर अविश्वास का सवाल कहाँ उठता है.सिर्फ मन से ये सोचना कि ये हो नही सकता ,गलत है.है न.

तो हम भगवान का अंश होते हुए भी जब भगवान् के पास ही नही जाना चाहते तो भगवान भी क्या करे.हमें कैसे अपने पास लायेंगे. हम भगवान के अंश हैं पर विभिन्नांश हैं.जैसेकि सूरज ऊपर है लेकिन सूरज की किरण तो नीचे आती है न.सूरज की किरण सूरज नही है लेकिन सूरज की किरण सूरज की वजह से है.जो हमारे ऊपर पर रही है.धुप सूरज की वजह से है.

इसीप्रकार से हम भगवान् की वजह से हैं.हमारा जो वजूद है उनकी वजह से है.पर जैसे सूर्य की किरण उसके अन्दर नही है.वो बाहर है.इसीप्रकार से हम भगवान के अन्दर की शक्ति नही हैं बाहर हैं.विभिन्नांश कहा गया है हमे.separated energy हैं हम भगवान की.

लेकिन फिर भी भगवान हमे तसल्ली देते हैं कि आप मेरे पास आ सकते हो.पूरी संभावना है.आप प्रयास करो मुझे पाने का.मुझमे मन को लगाओ.जब मेरे से आपका मन पूरी तरह तादात्म्य स्थापित कर लेगा तो आप मुझे प्राप्त कर लोगे.बहुत सुन्दर विधि है.प्राप्त करने का प्रयास करिये तो ये जितने भी आपके कष्ट है न वे कष्ट जैसे होंगे ही नही.वस्तुतः कष्ट रहेगा ही नही.

प्रश्न: भक्ति के साथ माता-पिता की भी सेवा करनी चाहिए.मै ऐसा करने में असमर्थ हूँ.जिसकी वजह से मै बहुत परेशान हूँ.मुझे क्या करना चाहिए?
समाधान: देखिये भक्ति करना बहुत अच्छी बात है.भक्ति करने के लिए ही इंसान का शरीर मिला है और आप इंसान के शरीर के अन्दर हो.उस इंसान के शरीर को बढाने में ,बड़ा करने में माँ-बाप की एक बड़ी भूमिका रही है भाई.उन्होंने पैदा किया शरीर को और शरीर का पालन-पोषण किया.और आज आप इतने बड़े हो गए.

आज आप अगर ये कहे कि भक्ति तो कर सकता हूँ पर माँ-बाप की सेवा नही कर सकता.ये possible नही है मेरे लिए तो ये गलत है.क्या चीज है जो आपको माँ-बाप के सेवा करने से रोक रही है.ममा-बाप ने तो कभी नही सोचा कि मै बच्चे को पैदा तो कर सकता हूँ पर इसे अनाथालय फेंक आऊ.मै इसका पालन-पोषण नही कर सकता.झंझट है झंझट.कौन इसके साथ रातों को जगे.कौन इसके साथ कष्ट सहे.ऐसा नही सोचा न.आपका हर कष्ट उन्होंने झेला और आपके साथ रहे.

आज जब अपने पैरों पर खड़े हो गए हो आप और हो सकता है कि आपका परिवार भी हो तो अब अपनी जड़ को भूल गये.ऐसा मत करिए.आने सांसारिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने से आप भगवान के प्यारे हो जायेंगे ऐसा कभी सोच भी मत लेना.

अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूर्ण करिए निर्लिप्त भाव से और लिप्तता सिर्फ भगवान में रखिये.यही एकमात्र सही तरीका है.

प्रश्न: कहा जाता है कि गीता जी के जैसा कोई ग्रन्थ नही.क्या ये बात सत्य है?
समाधान: देखिये सत्य है कि असत्य है मै कैसे बताऊँ.अगर आप गीताजी का अध्ययन करेंगे,पढेंगे तो पता चलेगा न.मेरे कहने से क्यों मान लेते हैं कि सत्य है कि असत्य है.गीताजी आपके पास मौजूद हैं.आप लीजिये उन्हें और हिन्दी आपको आती होगी,अंग्रेजी भी आती होगी.क्कोई भी भाषा में available है.अप्प लीजिये और उनका पठन-पाठन कीजिये

हाथ कंगन को आरसी क्या
पढ़े-लिखे को फारसी क्या.

वही वाली बात है.आप जब पढेंगे तो स्वयं ही जान जायेंगे.मुझसे पूछेंगे तो मै तो कहूंगी कि भगवद्गीता जैसा ग्रन्थ शायद ही कोई हो.

प्रश्न: तत्व भक्ति क्या है और कैसे की जाती है?
समाधान: बहुत अच्छा प्रश्न है आपका कि तत्व भक्ति क्या है और कैसे की जाती है.देखिये दुनिया में आप जो कुछ भी करते हैं वो सब कुछ असत है अगर उसका सम्बन्ध भगवान से न हो.भगवान ही एकमात्र तत्व हैं पूरे संसार में और हमारी आत्मा का सम्बन्ध भी उसी एक तत्व से है,भगवान् से है.

भगवान को प्रसन्न करने का नाम ही तत्व भक्ति है.

और कैसे करी जाती है.शुरुआत कीजिये भगवान् का नाम लेने से.भगवान का नाम लेते जाईये और भगवान का नाम लेने से जब आपका चित्त शुद्ध होने  लगेगा तो फिर आगे की सेवाएं आपको स्वयं पता चल जायेंगी और आप आगे स्वयं बढ़ते चले जायेंगे.

*******************************************************

Monday, January 20, 2014

प्रबुद्ध व्यक्ति कैसे अपने जीवन को जीता है:Explanation by Maa Premdhara(102.6 FM)

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा.नमस्कार.कैसे हैं आपआप सबको नया साल बहुत-बहुत मुबारक हो.भगवान करेइस नए साल में भक्ति से संबंधित आपकी सारी आकांक्षाएं,सारी उम्मीदें पूरी हो.आप भक्ति के क्षेत्र में और उन्नति कर पाएं,और आगे जाएँ.

तो हम सब पिछले कुछ दिनों से नया साल मना रहे हैं और बहुत सारे functions हुए,बहुत सारी festivities हई,बहुत उल्लास रहा नया साल मनाने में.अपने-अपने ढंग से सबने नया साल मनाया.लेकिन कई बार मै ये सोचती हूँ श्रोताओं कि भाई हम आत्मा के रूप में शाश्वत हैं.कभी भी नए नही होंगे.नयापन आत्मा में आता नही.हमेशा से आत्मा थी,है और रहेगी.ये काल,ये समय शाश्वत है.काल हमेशा से था,है और रहेगा.और माया भी तो शाश्वत है.माया कब समाप्त होती है?माया रहती है हमेशा.किसी व्यक्ति कि माया उसकी भक्ति से समाप्त होती है.पर इससे जो माया का अस्तित्व है वो तो समाप्त नही होता.कही किसी और को घेरती है जाकर माया.तो अब ये सारी चीजें जब शाश्वत हैं तो ऐसे में हम नया क्या ढूंढ रहे हैं.हमें पता ही नही चल रहा कि हमें नवीनता कहाँ मिलेगी.इसलिए हम शाश्वत काल को अनेक दिनों में,मासों में,सप्ताहों में बाँट-बाँटकर प्रसन्न हो रहे हैं कि चलो एक हप्ता बीत गया,एक महीना बीत गया,बारह महीने बीत गए.स्वयं हमने मापदंड तैयार किये और स्वयं ही प्रसन्न हो गए.

क्या करे?क्योंकि हमें पता नही न कि नवीनता आखिर कहाँ है?जो लोग काफी समय से program सुन रहे हैं,उन्हें आभास है,उन्हें पता है कि नवीनता सिर्फ और सिर्फ भगवान में है.भगवान आदि पुरुष हैं,शाश्वत हैं,प्राचीनतम हैं लेकिन नूतनता,नवीनता से भरे हुए हैं.है न.लेकिन ये हमें समझ नही आता क्योंकि हम अपने आप में निमग्न रहते हैं.शरीर की क्रियाओं में लिपटे रहते हैं.इए ही तो हमारा श्लोक आपको बता रहा है कि अगर आप अपने शरीर की क्रियाओं को मात्र द्रष्टा बनकर देखे और आप उसमे लिपटे नही तो आप प्रबुद्ध व्यक्ति कहलायेंगे और नए साल में ऐसी प्रबुद्धता हमको हासिल हो तो क्या बात है .

आईये सुनते हैं ये श्लोक जो आपको बता रहा है कि प्रबुद्ध व्यक्ति कैसे अपने जीवन को जीता है,शारीरिक क्रियाओं में नही फंसता.तो श्लोक है:
एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने ।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ।
न तथा बध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयन्गुणान् ।।

अर्थात्

प्रबुद्ध व्यक्ति विरक्त रहकर शरीर को लेटने,बैठने,चलने,नहाने,देखने,छूने,सूंघने,खाने,सुनने इत्यादि में लगाता है.लें वो कभी भी ऐसे कार्यों में फंसता नही.निस्संदेह वह समस्त शारीरिक कार्यों का साक्षी बनकर अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों में लगाता है और वह मूर्ख व्यक्ति की भांति उसमे फंसता नही.

तो बहुत ही सुन्दर श्लोक है.देखिये इसमे एक बहुत ही सुन्दर अंतर को बताया गया है.शरीर सबको मिला है.शरीर की क्रियाएं सबको करनी होती है.शरीर अपनी क्रियाएं करता है.आँख खुलती है बंद होती है.आँखों से हम देखते हैं.ऐसा व्यक्ति जो दुनिया में फंसा हो,जो दुनियावी सुख ढूँढता है और उसके पीछे मदमस्त है,प्रमत्त है उस व्यक्ति की आँखें भी कार्य करती हैं.वो भी देखता है लेकिन समस्या होती है कि जिस चीज को वो देखता है उन चीजों में वो लिप्त हो जाता है.उन चीजों से रसास्वादन लेता है.उन  चीजों में रस खोजता है.अपने देखने के जरिये वो देखने का रस खोजता है.

लेकिन जो प्रबुद्ध व्यक्ति है वो भी देखता है लेकिन उदासीनवत देखता है.देखा उसने भी.ये नही कि उसने आँखें बंद कर ली.सारे दृश्य उसकी नज़रों से भी गुजरे लेकिन वो उसमे लिप्त नही हुआ.वो उसे मात्र दृष्टा के रूप में देखता रहा.क्यों?क्योंकि उसका मन विरक्त है उन विषयों से जिनमे इन्द्रियां लगी हैं.इन्द्रियां तो अपने विषयों में लगेंगी ही.अब हमारे पास जीभ है,पेट है.पेट में भूख लगेगी तो जीभ खाने का रस तो लेगी न.खाने का रस लेगी और फिर खाना पेट में जाएगा तो फिर तृप्ति होगी.

वो एक व्यक्ति जो दुनिया के समस्त सुखों में डूबा हुआ है वो जब खायेगा तो चटकारे ले लेकर खायेगा,स्वाद ले लेकर खायेगा,स्वाद को ढूँढता-ढूँढता रह जाएगा,मारा-मारा फिरेगा स्वाद के लिए.ये स्वाद बहुत अच्छा है वो स्वाद बहुत अच्छा है,ये बहुत बढ़िया बना है,ये बहुत ख़राब बना है .

और प्रबुद्ध व्यक्ति जो भगवद ज्ञान में आगे है,जो जानता है कि भगवान का ज्ञान क्या है और भगवान का ज्ञान ही सर्वोच्च है .ऐसा व्यक्ति जब खायेगा तो कैसे खायेगा.उसे भी अच्छी चीज अच्छी लगेगी,बुरी चीज बुरी लग सकती है लेकिन वो उनमे लिप्त नही होगा.कोई चीज बहुत नमकीन हो गई तो भी वो खा जाएगा.कोई चीज बहुत कड़वी हो गयी तो वो खायेगा,उसकी जुबान सी-सी  करेगी,वो पानी भी पियेगा लेकिन ये नही कहेगा कि अरे! ये कितना बुरा खाना था.अरे! ये कितना अच्छा खाना था.रसास्वादन,ये वो भूल जाएगा.

हालाकि दोनों ही खाने की एक ही क्रिया कर रहे हैं.तो एक है आसक्त सुख में,आस्वादन में,रस में,विषयों में और दूसरा है विषयों से विरक्त.हालाकि विषय को स्पर्श कर रही हैं उसकी इन्द्रियां भी.

बहुत ही सुन्दर श्लोक है ये जिसे हम आपको सुना रहे हैं.इसी पर चर्चा करेंगे हम.सुनते रहिये समर्पण.

************************************************ 
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा और हम चर्चा कर रहे थे बहुत ही सुन्दर श्लोक पर:
एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने ।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ।
न तथा बध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयन्गुणान् ।।

अर्थात्

प्रबुद्ध व्यक्ति विरक्त रहकर शरीर को लेटने,बैठने,चलने,नहाने,देखने,छूने,सूंघने,खाने,सुनने इत्यादि में लगाता है.लें वो कभी भी ऐसे कार्यों में फंसता नही.निस्संदेह वह समस्त शारीरिक कार्यों का साक्षी बनकर अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों में लगाता है और वह मूर्ख व्यक्ति की भांति उसमे फंसता नही.

कितनी सुन्दर बात है.बहुत ही प्यारी चीज.है न.देखिये अगर हमारा शरीर लेट रहा है,बैठ रहा है.हम चल रहे हैं,हम नहा रहे हैं और उसमे अगर हम फंसे हैं.लेटे हैं.लेटने की जो position है वो ऐसी होनी चाहिए,यहाँ सुन्दर-सुन्दर mattresses होनी चाहिए,हम बैठे तो इतना सुन्दर सीट होनी चाहिए.या हम नहा रहे हैं तो चलो थोड़ा-सा इसमे हम इत्र डाल लेते हैं.नहाने से पहले थोड़ा ये लगा लेते हैं ,नहाने के बाद वो लगा लेते हैं.इससे skin ऐसी हो जायेगी,त्वचा ऐसी हो जायेगी.

ये है आसक्ति.नहाने का कार्य उस भगवदज्ञानयुक्त व्यक्ति ने भी किया.लेकिन आसक्त नही हुआ कि पहले ये लगा ले फिर ये लगा ले शरीर महकता रहेगा,गमकता रहेगा.कुछ नही.नहाना है तो नहाना है.बस.

या फिर सूंघने.कोई सोचता है कि ये खाने की खुशबू कैसी है?देखो अच्छी है न.tempting smell.और कोई सोचता है चलिए खाना बन गया,खा लीजिये.बोग लगाया,भगवान का प्रसाद आया,उसे पाया और बस.उसके अन्दर पाने ह्रदय को नही लगाता.ये नही लगाता कि चावल कैसे हैं?अच्छे हैं कि नही?quality कैसी है?बड़ी अच्छी quality के चावल खाए मैंने आज.बहुत अच्छा आटा,उसका हमने रोटी खाया.और इतना सुन्दर अचार वो बनाकर लायी थी.भाई तुम भी क्यों नही सीख लेती बनाना.इस तरीके से विषयों में फंसता नही.खाया उसने भी पर फंसता नही.

तो यहाँ बताया कि ये जो भगवान के भक्त होते हैं जब इनका शरीर कार्य करता है तो वो शारीरिक क्रियाओं के मात्र साक्षी होते हैं जैसे भगवान.भगवान हमारे ह्रदय में ही रहते हैं.और देखते हैं कि आत्मा विभिन्न क्रियाएँ कर रही है.विभिन्न भोगो को भोग रही है.वे साक्षी के रूप में बस देखते हैं.आत्मा जो क्रिया कर रही है उसमे लिप्त नही होते.

इसीप्रकार से हम शरीर से अलग हैं.हम शरीर नही हैं.हम शरीर हो भी नही सकते क्योंकि हम चेतन हैं और शरीर जड़ है.हमारी वजह से शरीर में चेतना आती है.और शरीर विभिन्न क्रियाओं में संलग्न हो सकता है हमारी चेतना की वजह से जो हमारी वजह से शरीर में व्याप्त होती है.शरीर क्या कर रहा है.ये सिर्फ देखा जाता है.दृष्टा भाव से,साक्षी भाव से.


जैसे कि मान लीजिये,एक example देती हूँ कि किसी ने बकरी पाली.बकरी जो है चारा चर रही है.घास चर रही है और जिसने पाली वह देख रहा है कि बकरी घास चर रही है लेकिन बकरी को उस घास में कितना आनंद आ रहा है,हरी-हरी घास में.वो खा रही है.कितना आनंद आ रहा है,कितना रस आ रहा है. वो व्यक्ति इस चीज से concerned नही है.इस चीज से कोई मतलब नही है.कि बकरी उस चीज को खाते हुए कितना आनंदित हो रही है.कोई मतलब नही है.बस इतने समय तक बकरी ने खाना है.अच्छा खा लिया.चलो भाई वापस.ठीक है.वो लिप्त नही हुआ उसके खाने की क्रिया में.उसने उसे खाने की सुविधा मुहैया करायी.बस इतना ही.

ऐसे ही जो भगवान के प्यारे भक्त हैं वो शरीर की क्रियाओं पर इतना ध्यान नही देते.वो शरीर को उसकी क्रिया करने देते हैं ताकि शरीर fit रहे और भगवान के भजन में काम आ सके.वास्तव में देखा जाए तो हमारा शरीर मिला ही भगवान के भजन के लिए है.इसका और कोई उद्देश्य नही है.कोई भी उद्देश्य नही है और हम अनेकानेक उद्देश्य गढ़ लेते हैं.अपना मन उन उद्देश्यों में झोंक देते हैं.अपने शरीर को उसमे झोंक देते हैं.अपनी आत्मा को उसमे गर्क कर देते हैं.ऐसे झूठे ख्वाब देखते हैं.अशाश्वत चीजों में अपनेआप को खपा डालते हैं.

और सोचिये ये कितनी बड़ी wastage है.कितनी बड़ी.ये जो व्यर्थता है.ये जो हमने अपने आप ओ जाया किया ,खर्च कर दिया इसकी भरपाई क्या हो सकेगी कभी.कभी भी नही.गया हुआ समय कभी भी वापस नही आता.इसलिए आईये नए साल में ये संकल्प ले कि हम एक लम्हे को भी जाया नही होने देंगे.सदा-सर्वदा भगवान से युक्त रहेंगे और भगवद प्राप्ति में अग्रसर होंगे.

इसी के साथ अब आज्ञा दीजिये प्रेमधारा को.नमस्कार.
************************************************ 

Tuesday, August 30, 2011

भगवान को समझने के लिए आप सिर्फ कल्पना का सहारा नही ले सकते:Explanation by Maa Premdhara(102.6 FM)

Spiritual Program SAMARPAN On 6th Aug, 2011(102.6 FM)
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .नमस्कार.कैसे हैं आप.एक दिन मै मंदिर गई.वहाँ देखा कि एक सज्जन प्रभु की प्रतिमा के आगे बैठकर आँसू बहा रहे थे.कभी उनके आँसू बहते तो कभी होंठो पर मुस्कान तैर जाती.दूसरे लोग उन्हें देखकर हैरान होते.एक ने तो कह भी दिया कि अजी दिखावा है सब.तो दूसरे ने कहा कि माना ये भगवान की मूर्ति है पर पत्थर की ही तो बनी है.वो देख थोड़े ही पाती है.फिर ये अपने भाव किसे दिखा रहे हैं.ये कहने के साथ ही उन्होंने प्रसाद का डिब्बा पुरोहित जी को दिए और बोले कि भोग लगाकर दीजिए तो.

उनकी बात सोचकर मै सोचने लगी कि यदि पत्थर की एक मूर्ति देख नही पाती तो खा कैसे सकती है.या फिर ये लोग सिर्फ रस्मे निभा रहे हैं.मैंने उनसे पूछ ही लिया कि भाई साहब आपको क्या लगता है,प्रभु आपके प्रसाद को खाते हैं?तो वे तपाक से बोल उठे कि नही जी खाते थोड़े हैं.अगर खाने लग जाए तो कोई भी उन्हें भोग नही लगायेगा.मुझे पता चल गया कि जनाब पूजा-पाठ करते जरूर हैं पर भगवान में विश्वास नही करते.उन्हें पता ही नही कि जिस भगवान को वे पत्थर कहते हैं वो पत्थर भी प्रभु की ही शक्ति है.क्या वैज्ञानिक अपने लैब में क्या पत्थर बना सकता है?जो भगवान कण-कण में हैं वो पत्थर में क्यों नही?आपने पत्थर देखना चाहा  तो पत्थर मिला.भावुक भक्त को तो पत्थर में भगवान दिख गए और कृपा भी बरसा गए.उसका हृदय शुद्ध हो गया.

इसीलिए तो शास्त्र कहते हैं

न नामरुपे गुणजन्मकर्मभि-
र्निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः |
मनोवचोभ्याममनुमेयवर्त्मनो 
देव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि ||(श्रीमद्भागवत,10.2.36)

अर्थात्
हे भगवान ! आपका दिव्य नाम,रूप,गुण,जन्म और कर्म वे लोग नही जान पाते जो सिर्फ कल्पना करके आपके बारे में अनुमान लगाते रहते हैं.आपको तो केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है.


तो सुना आपने भगवान के बारे में कितनी सुंदर बात कही गई है.है न.यहाँ साफ़ तौर पर बताया गया है कि भगवान को समझने के लिए आप सिर्फ कल्पना का सहारा नही ले सकते.भगवान का नाम,भगवान का रूप,भगवान के गुण,भगवान के जन्म और भगवान के कर्म ये दिव्य हैं.इन्हें जड़ बुद्धि से आप नही समझ सकते.आप अपनी आँखों से भगवान का दिव्य रूप नही देख सकते क्योंकि आपकी आँखें जड़ वस्तुओं को देखने की आदी है.

तो जो लोग भगवान के बारे में सिर्फ कल्पना करते रहते हैं और कल्पना के आधार पर भगवान के बारे में निष्कर्ष निकालते रहते हैं ऐसे लोग कभी भी भगवान को तत्त्व रूप में नही जान सकते.भगवान को जानना है तो आपको सिर्फ और सिर्फ भक्ति का सहारा लेना पडेगा.जब कोई व्यक्ति भगवान की प्रेम भक्ति में संलग्न होता है,जब कोई व्यक्ति भगवान से प्रेम करने लगता है,जब कोई व्यक्ति प्रेम से भगवान की सेवा करने लगता है तो जानते हैं क्या होता है?तब भगवान स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं.
************************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

हे भगवान ! आपका दिव्य नाम,रूप,गुण,जन्म और कर्म वे लोग नही जान पाते जो सिर्फ कल्पना करके आपके बारे में अनुमान लगाते रहते हैं.आपको तो केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है.


तो देखिये कितनी सुंदर बात प्रभु के बारे में.भगवान को यदि आप जानने चले पाने बल पर,अपने knowledge के बल पर,अपने रहन-सहन के बल पर,अपना जो background है उसके बल पर तो आप प्रभु को नही जान सकते.भगवान को जानने के लिए आपको भगवान के प्रति समर्पित होना होगा.पूर्णरूपेण समर्पित.अन्यथा आप सोचे कि भगवान का जो नाम है उसे लेकर के हम क्या सच में भवसागर पार कर पायेंगे.हो सकता है कि इसप्रकार के doubts आपके मन में आने लगे.

तो भगवान का नाम दिव्य है.ये श्लोक आपको बताता है.वो कोई भौतिक नाम नही है.ये नाम ऐसा है,जिसे आप लेते रहेंगे,लेते रहेंगे तो आप कभी थकेंगे नही.आपको नित्य नवीन रस की अनुभूति होगी.प्रभु का नाम ऐसा है जिसमे आपको शांति प्राप्त होगी.वो शांति कैसी?परा शांति प्राप्त होगी.याद है न आपको,आप परा प्रकृति हैं प्रभु की और परा प्रकृति को परा शांति की आवश्यकता होती है.परा शांति भगवान के नामों में छुपी है और भगवान का नाम ऐसा है जो भगवान से अभिन्न है.भगवान और भगवान का नाम एक है.ये आप जानते हैं.है न.

देखिये यदि आप किसी भौतिक वस्तु का नाम लेते हैं तो आप नोट करना कि थोड़ी ही देर में आपको थकावट महसूस होने लगेगी.आप बोर हो जायेंगे लेकिन भगवान का नाम यदि आप सारा दिन भी लेते रहे तो धीरे-धीरे नाम रस जागृत हो उठेगा.आपकी जिह्वा पर वो ऐसा लगेगा कि आप नाम के बगैर रह ही नही पायेंगे.यहाँ तक कि जब आप सोने जायेंगे तब भी आपके ह्रदय में भगवान का नाम गुंजारित हो रहा होगा,गूँज रहा होगा.आप आजमा के देख सकते हैं.

जब आप भगवान का नाम लेने लगेंगे तो आपके हृदय में जितने भी विकार हैं,जितने अशांति है,जितनी भी बेचैनी है वो दूर होने लगेगी.धीरे-धीरे नाम अपना असर दिखाने लगेगा और आपके दिल में भगवान के प्रति भक्ति पहले से ही है लेकिन वो सुप्तावस्था में है,सो रही है.किन्तु जैसे ही आप भगवान के नाम का स्मरण करेंगे,भगवान के नाम का कीर्तन करेंगे तो भगवान का नाम आपको वो भक्ति वापस दे देगा.वो भक्ति जागृत हो जायेगी.भगवान भी कहते हैं:
"नाहं तिष्ठामि वैकुंठे योगिनां  हृदयेषु वा |
तत्र तिष्ठामी नारद यत्र गायन्ति मद्भक्ताः ||"(पद्मपुराण)


"हे नारद ! न तो मै अपने निवास वैकुंठ में रहता हूँ,न योगियों के ह्रदय में रहता हूँ.मै तो उस स्थान में वास करता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरे पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं और मेरे रूप,लीलाओं और गुणों की चर्चा चलाते हैं."

तो यदि आपको भगवान को बुलाना है अपने पास,यदि आप भगवान को देखना चाहते हैं तो आप भगवान के नाम का कीर्तन कीजिये,भगवान के नाम का जाप कीजिये.
*********************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

न नामरुपे गुणजन्मकर्मभि-
र्निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः |
मनोवचोभ्याममनुमेयवर्त्मनो 
देव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि ||(श्रीमद्भागवत,10.2.36)

अर्थात्

हे भगवान ! आपका दिव्य नाम,रूप,गुण,जन्म और कर्म वे लोग नही जान पाते जो सिर्फ कल्पना करके आपके बारे में अनुमान लगाते रहते हैं.आपको तो केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है.


तो भगवान का दिव्य नाम,ये सबके समझ में नही आता और इसीतरह से भगवान का दिव्य रूप सबको दिखता नही,सबके लिए प्रकाशित नही होता.भगवान कहते भी हैं:

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।(श्रीमद्भगवद्गीता,7.25)
कि मै अपने आप को योगमाया से ढँक लेता हूँ,सबको नजर नही आता लेकिन यदि आप उन्हें देखना चाहे तो आप देख सकते हैं.क्यों?क्योंकि भगवान हैं और उन्हें देखा जा सकता है.पर उसकी condition है, शर्त्त है:
प्रेमांजनच्छुरितभक्तिविलोचनेन(ब्रह्म-संहिता)
जी हाँ,आपको अपनी आँखों में प्रेम का काजल लगाना होगा तो भगवान नजर आ जायेंगे.

लेकिन ये जो प्रेम है न वो भगवान से कर पाना बहुत सहज नही है.प्रेम आप अपने आसपास के लोगों से करते हैं,अपने बच्चों से करते हैं,अपनी पत्नी से करते हैं.लेकिन प्रेम भगवान से कर पाना ये जरा मुश्किल है,बहुत मुश्किल है.न ही हमें इसकी कोई training मिली होती है,न ही हमें इसकी कोई जरूरत महसूस होती है.पर यदि आप भौतिक जिंदगी से उब जाए,बोर हो जाए,कही से आपको ये पता चल जाए कि आपकी मनुष्य योनि का लक्ष्य ही प्रभु प्राप्ति है तो शायद आप उस दिशा में बढ़ जाए,शायद आपके ह्रदय में श्रद्धा जागृत हो जाए और धीरे-धीरे साधुसंग करके,भजन क्रिया प्रारंभ करके आप कभी-न-कभी प्रेम के स्तर को भी प्राप्त कर लेंगे.

जो लोग भगवान से प्रेम करते हैं वही भगवान को देख पाते हैं.एक जगह पर भक्त भगवान से कहता भी है कि
"हे भगवान!ये जो आपके चेहरे पर,आप पर ये रोशनी का पर्दा पड़ा है,ये रोशनी का पर्दा हटा लीजिए.मैआपको देख नही पा रहा.ये रोशनी मुझे आपको देखने नही दे रही.ये रोशनी का पर्दा हटा लीजिए."

शास्त्रों में ये जिक्र आया है.ठीक वैसे ही जैसे सूरज.मान लीजिए कोई सुबह जल्दी नही उठता.कोई ऐसा व्यक्ति है जो सुबह कभी भी जल्दी नही उठ पाता है और उसने हमेशा सुबह दस बजे का सूर्य देखा है.दिन में बारह बजे का सूर्य देखा है और अगर कोई उसे बताए कि सूरज में भी ठंढक होती है.तो उसे बड़ी हँसी आयेगी.वह कहेगा कि कैसी बातें कर रहे हो.मैंने तो सूरज को आग बरसाते देखा है.

लेकिन कोई कहे कि तुम सुबह-सुबह सूर्योदय देखो और तब वो देखेगा कि ये orange color का सुंदर-सा ball जैसा ये क्या है और इसे देख करके आँखें ठंढी-ठंढी हो रही हैं.अच्छा लग रहा है ह्रदय को,मन को.तो सूरज को भी आप नंगी आँखों से देख सकते हैं.लेकिन कब?जब वो उदित हो रहा है या अस्त हो रहा है.तो एक condition है,एक परिस्थिति है.इसके लिए आपको सुबह जल्दी उठना होगा या शाम को देर तक आसमान में टकटकी बाँधे देखना होगा.

इसीप्रकार से आप भगवान के रूप का दर्शन कर सकते हैं पर एक शर्त्त है.क्या? आपको भगवान के प्रति प्रेम से पेश आना होगा.आपके व्यवहार में भगवान के प्रति प्रेम-ही-प्रेम हो.आपकी क्रियाओं में भगवान के प्रति प्प्रेम-ही-प्रेम हो तो भगवान स्वयं को प्रकशित कर देंगे.
********************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

हे भगवान ! आपका दिव्य नाम,रूप,गुण,जन्म और कर्म वे लोग नही जान पाते जो सिर्फ कल्पना करके आपके बारे में अनुमान लगाते रहते हैं.आपको तो केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है.


तो देखिये भगवान के गुण,भगवान का जन्म और भगवान का कर्म लोगों को मोहित कर देता है.लोग सोचते हैं कि भगवान यदि पृथ्वी पर आ गए और वे नर रूप में आ गए,इंसान का रूप धर के आ गए तो वे इंसान हो गए.कई लोगों को हमने कहते भी सुना है कि भाई देखिये ये इंसान का रूप धर के आये हैं तो इन्हें सुख और दुःख सहना पड़ेगा.जबकि एक बात आप जान लीजिए कि भगवान यहाँ पर अगर आते हैं तो जो कुछ भी लीला वो करते हैं वह सिर्फ लीला होती है.कोई भी कर्म भगवान को बांध नही सकता.

हम और आप कर्म करते हैं क्योंकि हमने किसी खास गुण को अपने अंदर समाहित किया होता है--सतोगुण,रजोगुण,तमोगुण कुछ भी.लेकिन भगवान तो इन गुणों के निर्माता हैं.तो भगवान को ये गुण बिलकुल भी प्रभावित नही करते.सिर्फ कार्य करते दिखते  हैं लेकिन वे किसी कर्म से लिप्त नही होते.ये बात बारबार रट लीजिए,याद कर लीजिए तब आप भगवान को समझ पायेंगे.

तो भगवान के कर्म और जन्म ये दिव्य हैं.इसीलिए भगवान ने कहा है कि
"जो मेरा जन्म और कर्म की दिव्यता को समझ लेता है वो व्यक्ति कभी भी इस भौतिक जगत में दुबारा जन्म नही लेता."

तो भगवान के जन,कर्म ,गुण,दिव्य नाम को  समझना बहुत ही जरूरी है.तो यदि आप सोचे कि हम स्वयं शास्त्र पढ़ लेते हैं तो हमें समझ आ जाएगा.तो ये संभव नही है क्योंकि हमजिं गुणों में इससमय हैं-सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण.किसी भी गुण में हम होंगे तो शास्त्र की जो व्याख्या है अपने मनमाने ढंग से करेंगे.और कही से हम ये भी कहेंगे कि शास्त्र को भी तो किसी ने लिखा होगा.हम ये नही समझ पायेंगे कि जो भगवान कण-कण में हैं,जिस भगवान ने सूरज को ये आदेश दिया है कि यहाँ इतने समय उदित हो और इतने समय अस्त हो.ऐसे भगवान कितने-कितने दिव्य हैं.उनके बारे में हम अपनी मनमानी व्याख्या करेंगे तो ये अपराध होगा.

उनके बारे में अगर आपको तत्त्व से जानना है तो किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाना होगा जो भगवद तत्त्व में विशेषता हासिल किये हुए हो.जो भगवद् तत्त्वविद हो,जो गुरु हो,जो भगवान के प्रति समर्पित हो.

तो भगवान यहाँ पर बड़े सुन्दर तरीके से आपको ये बता रहे हैं कि आप उन्हें सिर्फ और सिर्फ भक्ति से जान सकते हैं.तो भक्ति बहुत सहज भी है और बहुत मुश्किल भी है.ऐसे लोग जिन्हें शास्त्र के वचनों पर यकीन है,विश्वास है कि जो शास्त्र कहते हैं -आप भक्ति कीजिये ,भगवान को प्राप्त कीजिये और भगवद्धाम जाईये,ऐसे लोग भक्ति कर सकते हैं.जिनमे संशय है वे कभी भी भक्ति की राह पर नही आ सकते और उनके लिए ही भगवान ने कहा है कि ऐसे लोग बारबार पतित हो जाते हैं,बारबार उन्हें मृत्यु पथ पर वापस लौटना पड़ता है.
********************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

हे भगवान ! आपका दिव्य नाम,रूप,गुण,जन्म और कर्म वे लोग नही जान पाते जो सिर्फ कल्पना करके आपके बारे में अनुमान लगाते रहते हैं.आपको तो केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है.


और सही बात है कि भगवान को अपनी कल्पनाओं से नही जान सकते,ये बात समझ ही चुके होंगे आप.देखिये भगवान को जानने के लिए जरूरी है कि हमारे अंदर कुछ गुण उत्पन्न हो.हमारे अंदर दैवीय गुण उत्पन्न हो.और तब हम भगवान को जान सकते हैं.तो इसी बात पर मुझे एक कथा याद आ गई:

एकबार एक professor वेदों के ऊपर lecture दे रहा था अपने students को. lectures के दौरान उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञानी व्यक्ति वो है जो कि बहुत कठिन समय में भी मुस्कराता रहे.ये बात बच्चों को समझ में नही आयी.उन्होंने कहा कि sir,ऐसा कैसे हो सकता है.बहुत कठिन समय आये तो कैसे मुस्कराया जा सकता है.ये बात सुनकर professor ने कहा कि हाँ,तुम सही कहते हो.मैस्वयं भी नही मुस्करा पाता ऐसे समय लेकिन मै एक ऐसे आदमी को जानता हूँ.हमारे ही इधर एक आदमी है जो बिल्कुल सच्चे संत की तरह रहता है.उसे संत कह सकते हो.

जानते हो ,वह एक अनाथ था.जब वो बड़ा हुआ तो एक दुर्घटना में उसकी दोनों टाँगे चली गई और इसीतरह से संघर्ष करते-करते,करते-करते वो  यहाँ तक पहुंचा.मतलब उसका जीवन दर्द की कहानी है लेकिन जब तुम उससे मिलोगे तो देखोगे कि वह हमेशा मुस्कराते रहता है.ये सुनकर सारे विद्यार्थियों ने कहा कि sir,हम तो ऐसे बहादुर आदमी से मिलना चाहते हैं.सबके सब उस व्यक्ति के घर गए और जब उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो 73 साल का एकव्यक्ति व्हील चेयर पर बैठकर के दरवाजा खोलने आया और बहुत ही प्यार से मुस्कराते हुए उसने कहा कि कहिये मै आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ.बच्चों ने कहा कि sir,हम ये जानना चाहते हैं कि आप इतनी मुश्किलों में भी,इतने दर्द में भी,इतने pain में भी कैसे मुस्कराते रह सकते हैं.

उस आदमी ने कहा कि देखिये मुझे दर है ये बताते हुए कि आप एक गलत address पर आ गए हैं,गलत पते पर आ गए हैं.मुझे तो कभी कोई दुःख ही नही सहना पड़ा क्योंकि भगवान हमेशा ही मेरे प्रति दयावान रहे,दयालु रहे.उन्होंने अपनी दया के जरिये हमेशा-हमेशा मेरी रक्षा की.मै आपको कैसे सीखा सकता हूँ कि difficulties में कैसे मुस्कराया जा सकता है.कठिन समय में कैसे मुस्कराया जा सकता है.

ये उत्तर सुनकर के सारे के सारे students अवाक रह गए और सही बात है,भगवान भी तो यही बात कहते हैं कि
"हे कुन्तीपुत्र ! जो सुख और दुःख है वो अशाश्वत हैं,अस्थायी है और वे इसीतरह से आते-जाते हैं जैसे कि सर्दी और गर्मी.तो इन्हें सहना सीखिए" 

तो बहुत ही सुन्दर बात है.हमारे अंदर जब ऐसे गुण उत्पन्न होंगे हम तभी प्रभु को समझने का प्रयास कर पायेंगे.
***********************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और अब बारी है आपके sms को कार्यक्रम में शामिल करने की.
SMS: महाराष्ट्र से अजय कहते हैं कि हम हवा के बिना एक पल भी नही जी सकते फिर भी पानी को जीवन क्यों कहते हैं?
Reply: अजय जी ,आप बिल्कुल सही बात कहते हैं.हवा के बिना हम एक पल भी नही जी सकते.लेकिन पानी को जीवन इसलिए कहते हैं कि मीठा पानी कम मात्रा में आता है न.गर्मियों में आपके घर में जो पानी है वो बहुत मुश्किलों से आता है.आता है कभी नही भी आता है.आपको रतजगा करना पड़ता है.रात को जागना पडता है.इसीलिए कहा जाता है कि पानी की बूँद-बूँद कीमती है,पानी बचाए.

इसीलिए पानी को जीवन कहा जाता है क्योंकि पानी बड़ी मुश्किल से आपके घर तक आता है.लेकिन देखा जाए तो पानी भी जीवन है,हवा भी जीवन है,पृथ्वी भी जीवन है,अग्नि भी जीवन है.तो इस चीज को आप याद रखिये.

SMS: मल्कागंज,कबीरबस्ती से विनोद कुमार लिखते हैं कि  परा और अपरा प्रकृति का अर्थ समझाईये.
Reply: विनोद जी,परा प्रकृति तो आप स्वयं हैं न भगवान की.भगवान ने बताया है कि जितने भी जीव हैं वे मेरी परा प्रकृति हैं.

Wednesday, August 3, 2011

जो हमारे ह्रदय में बैठे हैं उस ईश्वर से हमें प्रेम करना सीखना है:Explanation by Maa Premdhara(102.6 FM)

Spiritual Program SAMARPAN On 31st July, 2011(102.6 FM)
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .नमस्कार.कैसे हैं आप.कुछ दिन पहले मैंने  उड़ती-उड़ती खबर सुनी कि कुछ दिन बाद scientist ऐसी दवा बनायेंगे जिससे कोई मरेगा नही.सब सदा के लिए जीयेंगे,अमर हो जायेंगे.मई सोचने लगी कि मान लीजिए कि वो दवा खाकर हम जीते रहे और जीते-जीते बूढ़े होते चले गए और फिर बुढ़ापे में खाट पकड़ ली पर प्राण निकले ही नही.खूब तकलीफ झेल रहा हो शरीर.मन बारबार छटपटा रहा हो कि भगवान अब तो उठा लो.लेकिन अमरता की गोली खाकर प्राण निकले ही नही तब सोचिये क्या हालत होगी इंसान की.

और ऊपर से नए लोग तो पैदा होंगे ही पर मरे कोई नही.तो अंततः सब कम पड़ जायेंगे.आप भूख से तड़प रहे होंगे,प्यासे होंगे पर न खाना है,न पानी और न ही प्राण निकलेंगे.तो दुःख भरा जीवन शाश्वत अगर हो जाए तो तकलीफ लोगों को हो जायेगी.कितनी तकलीफ हो जायेगी.इसीलिए देखा जाए तो मृत्यु भी एक वरदान है.पर मृत्यु हल नही है,कोई solution नही है.

सोचिये क्यों इंसान चाहता है कि वो कभी मरे ही नही?क्योंकि वो कभी मरता नही.आत्मा सदा रहती है पर शरीर बदल जाते हैं.क्यों हमे दुःख झेलने पड़ते हैं जबकि हम दुखी होना नही चाहते?जवाब है कि दुखों को हम खुद चुनते हैं.भगवान हमें बताते हैं वो तरीका जिससे हम अमरता को हासिल कर सके बिना कष्ट के.सुख आनंद मिले वो भी बिना दुखों के.भगवान हमारा मार्गदर्शन करते हैं इन शब्दों के द्वारा:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
अर्थात्
"हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के ह्रदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र में सवार की भांति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा(भरमा) रहे हैं.हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ.उसकी कृपा से तुम परम शांति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे."

तो देखा कितना सुंदर श्लोक है.बहुत-ही प्यारा.भगवान बता रहे हैं कि ईश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है.आपने सुना भी है:
मोको कहाँ ढूंढें से बंदे,मै तो तेरे पास में.
सही बात है.भगवान हमारे पास हैं,हमारे ह्रदय में हैं.तो ये थोड़ी खुशी की बात है और डर की बात भी है.क्यों?क्योंकि खुशी की बात ये हैं कि  अरे वाह! भगवान ,ईश्वर हमारे पास है.कितनी खुशी की बात है कि हम अकेले नही हैं.हमारे साथ भगवान हैं.लेकिन डर की बात ये है कि अब मै कुछ बुरा नही सोच सकता.किसी के लिए गलत नही सोच सकता.स्वार्थी नही बन सकता.किसी का अहित नही कर सकता.क्यों?क्योंकि भगवान सब देख रहे हैं.देख रहे हैं.नोट हो रहा होगा.फल मिलेगा.

तो बहुत सतर्क होना है.जो हमारे ह्रदय में बैठे हैं उस ईश्वर से हमें प्रेम करना सीखना है.है कि नही.
*************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

"हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के ह्रदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र में सवार की भांति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा(भरमा) रहे हैं.हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ.उसकी कृपा से तुम परम शांति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे."

तो बड़ी सुन्दर बात भगवान आपको बता रहे हैं.भगवान जो आपके हृदय में स्थित हैं वो जानते हैं कि आप क्या चाहते हैं?वो जानते हैं कि आप चाहते हैं कि माया का सुख लूट सके.इसीलिए भगवान आपको अपनी माया से घुमाते रहते हैं.जैसेकि मान लीजिए एक बहुत बड़ा झूला है और वो झूला कभी ऊपर जाता है,कभी नीचे आता है.तो उस झूले पर कोई किसी को पकड़ कर बिठा नही देता जबरदस्ती.उस झूले पर बैठने के लिए लोग खुद जाते हैं.और उस झूले पर बैठकर सोचते हैं कि हमे आनंद मिलेगा.है न.

इसीप्रकार ये जो संसार है,जो भगवान की भौतिक शक्तियों से निर्मित है.भगवान की माया शक्ति.तो इस संसार में हम अपनी मर्जी से आते हैं क्योंकि भगवान हमारे ह्रदय मे हैं.वो हमारी इच्छाओं को नोट करते हैं.तो भगवान कहते हैं कि मै सब जीव के हृदय में हूँ और आज आपको जो भी परिस्थिति मिली है वो आपको आपके कर्मों के द्वारा मिली है.आपने इसप्रकार के कर्म किये और उसका result आपको भोगना पड़ा है.

कौन दे रहा है ये फल?भगवान कहते हैं-मै क्योंकि मै आपके हृदय में बैठकर सब हिसाब-किताब रख रहा हूँ और आपको यथोचित फल भी प्रदान कर रहा हूँ.तो भगवान हमें यानी कि सारे जीवों को,जीव का अर्थ आप जानते ही हैं.सिर्फ मनुष्य ही नही.जीव का अर्थ है जो भी प्राणी आप अपने सामने देखते हैं ,सब ,भगवान की माया से यहाँ-वहाँ घूम रहे हैं.किन्तु तो भी उस माया से निकलने का एक रास्ता है.

भगवान कहते हैं कि अगर आप सभी प्रकार से भगवान की शरण लेंगे,उस परमेश्वर की शरण लेंगे जो आपके हृदय में स्थित है तो आपको परम शांति प्राप्त होगी.और आपको परम नित्यधाम भी प्राप्त होगा.शांति तो मिलेगी साथ ही नित्य धाम भी मिलेगा.दोनों चीजें एक साथ आपको प्राप्त हो जायेगी.आज आप अशांत हैं क्योंकि आपने ये नही देखा कि जो इस माया के पीछे है वो driver,जो इसे drive कर रहा है.भगवान जो कह रहे हैं कि मै सबको घुमा रहा हूँ. उसे आपने नही देखा,उसे ignore कर दिया जबकि भगवान कहते हैं कि अगर आप उन तक जायेंगे,उन्हें समर्पित होंगे तो ही आपको परम शांति प्राप्त होगी.

तत्प्रसादात्परां शान्तिं ,उन्ही के प्रसाद से,उन्ही की कृपा से.अपने आप अगर शांति को खोजने निकलेंगे,सुख-चैन को खोजने निकलेंगे तो वह आपको कभी प्राप्त नही होगा.जान लीजिए.
***************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर:

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
अर्थात्
"हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के ह्रदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र में सवार की भांति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा(भरमा) रहे हैं.हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ.उसकी कृपा से तुम परम शांति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे."

तो देखिये भगवान ने यहाँ एक तरह से ये स्पष्ट कर दिया है कि वो लोग जो घूम रहे हैं माया के यंत्र पर सवार हो करके.वो ऐसे लोग हैं जो भगवान की शरण में नही गए.वो ऐसे लोग हैं जो अपनी इच्छाओं की शरण में गए.वो ऐसे लोग हैं जो इच्छाओं रूपी मृग मरीचिका को शांत करने के लिए दौड़े जा रहे हैं,दौड़े जा रहे हैं और वे इस छलावे में,इस भूल में सदा-सर्वदा रहेंगे कि उन्हें इस माया के संसार में,इस माया रूपी जगत में सुख प्राप्त हो सकता है.

यहाँ सुख तो है लेकिन perverted रूप में है.असल सुख तो भगवद्धाम में है.परम नित्य धाम में है.भगवान के धाम में है और ये भी स्पष्ट भगवान ने इस श्लोक में कर दिया है.भगवान ने अपने सबसे प्रिय सखा,अपने सबसे प्रिय शिष्य को ये हिदायत दी है,आदेश दिया है कि वो भगवान की शरण में जाए.

आप भी भगवान के प्रिय बन सकते हैं यदि आप भगवान की शरण में आये.आप भी भगवान से प्रेम कर सकते हैं यदि आप भगवान की बातों को माने.यदि आप भगवान की सत्ता को ही नही,भगवान को अपने जीवन का अभीष्ट अंग बना ले.ये न सोचे कि पहले मुझे ये तय करने दो कि भगवान है कि नही है.देखिये इतनी गूढ़ बातें भला कौन बता सकता है.

मान लीजिए कि किसी ने एक breeze बनाया है तो breeze का निर्माता ही तो आपको बताएगा कि इस breeze में क्या खास बात है.इसमें क्या समस्याएं पैदा हो सकती है.इसके साथ आपको किस प्रकार से व्यवहार करना चाहिए.इसीप्रकार से इस जगत को भगवान ने बनाया है.ये जीव भगवान के अंश हैं और दो तरह के जीव हैं.ये बात भी इस श्लोक से उभरकर के सामने आयी है.वो लोग जो भगवान की शरण नही लेते और वो घुमे जा रहे हैं गोल-गोल और वो लोग जो भगवान की शरण लेते हैं.

जो लोग की शरण नही लेते वे बेचारे ऊपर-नीचे आते-जाते रहते हैं.कभी उच्च लोकों में जाते हैं,कभी निम्न लोकों में जाते हैं.कभी पृथ्वी पर बने रह जाते हैं.वो कभी भी छुटकारा प्राप्त नही कर पाते.लेकिन दूसरे लोग जो भगवान की शरण में जाते हैं ,सुखी रहते हैं क्योंकि उन्हें तत्काल परम शांति प्राप्त हो जाती है और बाद में प्राप्त होता है भगवान का परम नित्य धाम.
********************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .हम चर्चा कर रहे हैं बहुत ही सुन्दर श्लोक पर  जिसमे भगवान कह रहे हैं:

"हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के ह्रदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र में सवार की भांति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा(भरमा) रहे हैं.हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ.उसकी कृपा से तुम परम शांति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे."

तो आप ये जानते होंगे कि प्रत्येक जीव भगवान की परा प्रकृति है और ये जो material चीजें,निर्जीव चीजें आप देख रहे हैं-भूमि,वायु,जल,अग्नि,आकाश, ये सब भगवान की अपरा प्रकृति है.है न.हम परा प्रकृति जब अपरा प्रकृति से सुख उठाने की कोशिश करते हैं,इसमें सुख ढूंढते हैं तो हमारे प्रयास विफल हो जाते हैं.जिन चीजों में आप सुख ढूंढते हैं वो याद रखियेगा इन्ही पाँचों में तब्दील हो जायेंगी.जल जल में मिल जाएगा.आकाश आकाश में मिल जाएगा.पृथ्वी पृथ्वी में मिल जायेगी.इसीतरह से पाँचों चीजें पाँचों में मिल जायेगी.कार्बन आपके हाथ में रह जाएगा.

और सोचिये शाश्वत आत्मा जो कभी नही मरती वो कार्बन में खुश होती है?वो मिट्टी से खुश होती है?तो मिट्टी से खुश होने की जो प्रवृति है हमारी वो भूल है क्योंकि यहाँ आपको खुशी मिलेगी नही.भगवान कहते हैं कि भाई आप परा प्रकृति है तो आपको परा शांति,परा सुख प्राप्त होना चाहिए.परन्तु वो तभी प्राप्त होगा जब आप परा शक्ति के मूल को पकड़ोगे.जहाँ से ये परा और अपरा दोनों आयी है.कहाँ से आयी है?परा शक्ति कहाँ से आयी है?परा शक्ति भगवान से आयी है.


हम भगवान के अंश हैं ये आप जान चुके हैं.जिसके अंश हैं यदि आप उसके तरफ नही मुडेंगे तो आप अपने जीवन को विफल कर देंगे.तो ऐसा नही होना चाहिए.हमें भगवान के तरफ मुडना चाहिए.भगवान से  प्रीत लगानी चाहिए.
**************************************

Tuesday, August 2, 2011

कैसे हम भगवान तक पहुंच सकते हैं,भगवान को याद करके:Explanation by Maa Premdhara(102.6 FM)

Spiritual Program SAMARPAN On 30th July, 2011(102.6 FM)
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा .नमस्कार.कैसे हैं आप.आप किसी को कहिये कि भाई भक्ति कीजिये.प्रभु की भक्ति करने के लिए ही तो मनुष्य जीवन मिला है.तो आप जानते हैं कि लोग क्या कहते हैं.कह देते हैं की अरे भाई अभी तो बहुत काम है,बच्चों को पालना है,पोसना है,नौकरी करनी है.इतने busy हैं हम.time कहाँ है जो भक्ति करे.कुछ तो ये भी कह देते हैं कि भक्ति करना तो बेकार लोगों का काम है.हमारे पास तो बहुत काम है.कुछ लोग कहते हैं कि जब free हो जायेंगे तब भगवान के बारे में सोचेंगे.अभी तो बहुत व्यस्त हैं.

भगवान जानते हैं कि इंसान उन तक न आने के लिए बहुत बहाने बनाता है.इसीलिए तो भगवान कहते हैं :
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥(भगवद्गीता,8.7)
अर्थात्
हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो भगवान देखिये यहाँ कितना सुन्दर तरीका आपको बता रहे हैं.कैसे आप भक्ति में रहे.कैसे आप भगवान का ध्यान करे.कईबार लोग मुझसे पूछते हैं कि हम कभी मंदिर नही जाते,हम पूजा-पाठ नही करते तो इसका मतलब क्या हम पापी हैं?भगवान ने देखिये यहाँ नही कहा है कि आप मेरे दरवाजे पर आईये,मेरे दर पर आईये.भगवान ने कहा है कि जहाँ भी आप हैं,जो कुछ कर रहे हैं करते रहिये.किसी चीज को छोडने की जरूरत नही है.कुछ मत छोडिये लेकिन मेरा चिंतन अवश्य कीजिये.कैसे ,र्वेषु कालेषु,हर वक्त,हर समय,हर पल,हर क्षण मेरा स्मरण करते रहिये.

तो भगवान ने बहुत सुन्दर नुस्खा बताया है कि कैसे हम भगवान तक पहुंच सकते हैं,भगवान को याद करके.है न.भगवान को याद करना बहुत सहज है.बहुत ही सहज है.लेकिन इसके लिए हमें ये याद रखना होगा कि भगवान से हमारा संबंध क्या है?अगर आपको कोई संबंध नजर नही आता तो आप कोई संबंध बना लीजिए.कोई संबंध जोड़ लीजिए.फिर उस संबंध को पोषित कीजिये.धीरे-धीरे,धीरे-धीरे आप उस संबंध के आदी हो जायेंगे और जब वो संबंध आप भगवान से अच्छी तरह से जोड़ लेंगे तब आपको आदत हो जायेगी भगवान के बारे में सोचने की.यही तरीका है जिससे आप हर समय,हर क्षण भक्ति कर सकते हैं और आपका समय भी जाया नही होगा.
**********************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत-ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:
हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो देखिये यहाँ अर्जुन को कहा गया है कि तुम्हे मेरा चिंतन करना चाहिए और युद्ध भी करना चाहिए.दोनों चीजें करनी चाहिए.कभी आपने सुना है कि दो चीजें,दो काम एक साथ हो.थोडा मुश्किल है न.दो काम एक साथ कैसे हो सकता है.लेकिन भगवान कहते हैं कि मन से मेरे बारे में सोचो और तन से अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करो.अर्जुन योद्धा थे तो ये अर्जुन का कर्त्तव्य था कि वे युद्ध करे.तो भगवान ने कहा कि देखिये जब आप इतने हिंसक कार्य को कर रहे हैं तो बेशक ये हिंसक कार्य पाप है.लेकिन याद रखना कि ये मेरी आज्ञा से आप कर रहे हैं.मैंने आपको आज्ञा दी है कि आप जो अन्यायी लोग हैं उनका वध करे.

जैसे कि अगर सरकार किसी सैनिक को यह आज्ञा देती है कि वह front पर जाकर लड़ाई करे और वे जब अधिकाधिक शत्रुओं का वध करते हैं तो फिर सरकार उन्हें मेडल देती है.यह पाप नही है.इसीप्रकार जब भगवान की आज्ञा है की आप जाकर के आतातायी लोगों का वध करे.अधर्म का नाश करे और धर्म की स्थापना कीजिये तब ये पाप नही है.और वो भी किसतरह से कीजिये.मेरे लिए कीजिये.मुझे याद करते हुए कीजिये.

तो देखिये याद करने का काम आँखों का नही.याद करने का काम नाक का नही है.याद करने का काम कान का नही है.याद करने का काम सिर्फ और सिर्फ मन का है.शुद्ध मन का है.

तो मन युद्ध नही कर रहा.तन युद्ध कर रहा है.मन खाना नही बना रहा तन खाना बना रहा है.मन पढाई नही कर रहा तन पढाई कर रहा है.है न.तो भगवान ने यहाँ तरीका बताया है कि भाई जो कुछ कर्त्तव्य आपका है उस कर्त्तव्य को आप पूरा करिये.काम करने के लिए भगवान मना नही करते.अर्जुन ने एकबार कहा कि मै जाकर के संन्यास ले लेता हूँ.किसी गुफा में बैठकर के भगवान का नाम लूँगा.ये हिंसा मुझे नही करनी है.तो भगवान ने कहा कि नही,ये तो आपका कर्त्तव्य है क्योंकि आप योद्धा है,क्षत्रिय हैं.

तो इसीप्रकार से अगर एक student कहे ,एक विद्यार्थी कहे कि नही मुझे तो भगवान का नाम लेना है ,मुझे पढ़ाई नही करनी.तो आप इस श्लोक से सीख सकते हैं.भगवान कहते हैं कि नही,पढाई करनी है.अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करना हैऔर उस पढाई को भी मुझे समर्पित कर दो.और जब तुम ऐसा करोगे तो उस कार्य से बंधोगे नही.पहली बात.और दूसरी बात कि तुम मेरा चिंतन करो.मेरे बारे में सोचो,मेरे ख्यालों में डूबो.तुम ऐसा करोगे तो तुम सारे कामों को करते हुए भी मुक्त रहोगे और मुझे प्राप्त कर पाओगे.
*****************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत-ही सुन्दर श्लोक पर :

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥(भगवद्गीता,8.7)
अर्थात्
हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो बहुत सुन्दर बात भगवान ने बतायी है.देखिये कितने ही लोगों के मन में ये संशय रहते हैं कि जो इंसान भक्ति करने के लिए आगे बढ़ता है वो फिर कुछ और नही कर सकता.या फिर जो बहुत कुछ करता है,बहुत सारे काम करता है वो भक्ति नही कर सकता.भगवान ने कहा है कि आप कितने ही कार्यों को करे,कोई समस्या नही है.पर आपके विचार मुझ तक आने चाहिए.आपके विचारों में मेरा वास होना चाहिए.मन से भगवान का चिंतन करना है.मन से.और बुद्धि से भगवान की शरण ग्रहण करनी है.
मन और बुद्धि को भगवान के चरणकमलों में स्थिर करना है.

मन कही जाने न पाए.जिस काम को आप कर रहे हैं मन उस में इतना न रम जाए कि वो काम ही आपके लिए सर्वोपरी हो जाए.भगवान बिल्कुल हाशिए पर आकर खड़े हो जाए.ऐसा मत करना.या आप जिस काम को कर रहे हैं .ऐसे मत करना कि उस काम से इतना प्रेम हो जाए,इतना प्रेम हो जाए कि आपको इस जीवन की अशाश्वतता नजर न आये.आपको ये नजर ही न आये कि ये काम भी एक दिन समाप्त होगा.जो कुछ मई जोड़ रहा हूँ वो भी समाप्त होगा.ये शरीर भी समाप्त होगा.तब क्या होगा?

तब चौरासी लाख योनियों में जाना पड़ेगा.धक्का मार दिया जाएगा हमें.और भगवान यहाँ chance दे रहे हैं.भगवान ने आपसे कुछ नही माँगा.भगवान ने नही कहा कि आप मुझे अपना धन दे दो.भगवान ने नही कहा कि आप अपना सुंदर तन दे दो.भगवान ने आपसे कुछ भी तो नही माँगा.मगर भगवान ने कहा कि जिस संदूक में आप बांध हो न,उस संदूक की चाभी भी आप ही के पास है.ये वही बात हो गई कि आदमी किसी बड़े से संदूक में झाँक रहा हो और फिर उसमे गिर जाए और वो संदूक अपने आप बंद हो जाए.ताला लग जाये.और चाभी उसी आदमी के पास है.

तो भगवान यहाँ बता रहे हैं कि जो यह मायाजाल रचा हुआ है न.इस मायाजाल को काटने के लिए मैंने आपको अस्त्र भी प्रदान कर दिए हैं.सुंदर दो अस्त्र आपको दिए हैं-मन और बुद्धि.भगवान कहते हैं कि इन अस्त्रों को इस्तेमाल करो और ये जो भवबंधन है उसे काटकर मेरे पास आ जाओ.मुझे प्राप्त कर लो.मै बाहर खड़ा हूँ.हाथ फैलाये.और चाभी तुम्हारे पास है.है न.

तो भगवान ये कहते हैं कि मन और बुद्धि भगवान को समर्पित कीजिये ताकि आप अंततः भगवान को प्राप्त कर पाए.
*****************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत-ही सुन्दर श्लोक परभगवान कहते हैं कि
हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो भगवान ने सहज उपाय बताया है मगर ये उपाय बहुत-बहुत मुश्किल भी है.आसक्त लोगों के लिए बहुत मुश्किल है.भगवन ने कहा कि आपको अपना काम कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए.लेकिन हम लोग क्या करते हैं?हम अपने कर्म में इतना,इतना डूब जाते हैं और उन कर्मों को हम अपनी खुशी के लिए करते हैं.अपनी तुष्टि के लिए करते हैं और जब हम ऐसा करते हैं तब हमारे मन और हमारी बुद्धि दोनों उस कर्म के अधीन हो जाती है.बार-बार हम उसी काम के बारे में सोचते हैं.बार-बार हम सोचते हैं कि कैसे compete करे,इससे हमें क्या लाभ होगा.उस लाभ को प्राप्त करके हम क्या करेंगे,क्या नही करेंगे.बहुत सारे plans हम बनाते हैं.

तो भगवान ने कहा है कि ये सब नही करना है.जो काम तुम कर रहे हो उसे मुझे अर्पित कर दो.मेरे लिए काम करो.अपने लिए मत सोचो.ये मत सोचो कि इस काम से मेरा क्या भला होगा.मेरा विकास कैसे होगा.मै कैसे आगे जाऊंगा.भगवान तो कहते हैं कि कुछ नही करना है.सिर्फ दुनिया भर के कामों को कर्त्तव्य के रूप में करना और उन कामों को मुझे अर्पित कर देना.इससे तुम मुक्त रहोगे.लेकिन जो अपनी  position  से आसक्त होता है या जो पैसों के प्रति आसक्त होता है,जो कार्यों के प्रति आसक्त होता है वो कभी भगवान को प्राप्त नही करना चाहता.कभी नही प्राप्त करना चाहता.सिर्फ सोचता है कि इसी जीवन में मै Best कर लूँ,इसी जीवन में इतना नामी बन जाऊं,इसी जीवन में मेरा इतना यश गान हो जाए.

सिर्फ मेरा,मेरा,मै,मेरा.यही सोचता रहता है और जो व्यक्ति इसप्रकार की सोच रखता है वो प्रभु को सपने में भी प्राप्त नही कर सकता.वो जो भी काम करेगा उसे अंततः निराशा ही हाथ लगेगी.वो जो कुछ करेगा उससे उसे दुःख ही प्राप्त होगा.चाहे वो इस दुःख को समझ पाए या न समझ पाए.कभी भी तुष्ट नही होगा.संतुष्टि उसे कभी प्राप्त नही होगी..

और भगवान इस श्लोक में आपको बहुत अच्छी तरह से बताते हैं कि आप सारे कार्य करना लेकिन मुझे प्राप्त करने का प्रयास जरूर करना.ये न हो कि अपने कार्यों में आप इतने मगन हो जाए कि मुझे प्राप्त करने के बारे में आप सोचे ही न.ये आपको बेकार बात लगे.आप सोचे कि बुढ़ापे में भगवान  को प्राप्त करने के बारे में सोचेंगे.ये गलत ख्याल है.इसीलिए तो भगवान ने कहा है कि बुढ़ापा क्यों?बचपन से आप अपना काम कीजिये.खेलना है खेलिए.लेकिन मन और बुद्धि यदि भगवान में लगे रहेंगे तो किसी भी काम से,किसी भी कर्म से आप बंधेंगे नही.

भगवान कहते हैं कि इसीतरह से एक-न-एक दिन तुम मुझे प्राप्त कर सकोगे.
************************************************

कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत-ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:
हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो सही बात कही है भगवान ने.बहुत प्यारी बात बतायी है कि यदि हम भगवान में अपने मन को लगा ले किसी भी तरह से.मन हर बार यहाँ-वहाँ जायेगा लेकिन तो भी यदि हम मन को खींचकर प्रभु के चरणों में वापस लाये और बारम्बार इस चीज का अभ्यास करे तो एकदिन मन भगवान में लग जाएगा.आपके मन में जितने भी प्रश्न हैं उनके उत्तर स्वतः आपको मिल जायेंगे.और अगर आपके प्रश्नों के उत्तर आपको न मिले तो आप अपने गुरु के पास भी जा सकते हैं.महात्माओं के पास जा सकते हैं.इन्हें अध्यात्म का ज्ञान है.

ऐसे ही एक राजा जिनके मन में कुछ प्रश्न थे.जिनके उत्तर की उन्हें तलाश थी.वे एक महात्मा के पास पहुँचे.महात्मा ने कहा कि अभी मेरे पास समय नही है.मुझे  अपनी वाटिका बनानी है.राजा भी उनकी मदद करने में जुट गए.इतने में एक घायल आदमी भागता-भागता आया और गिरकर बेहोश ही गया.महात्माजी ने उसके घाव पर दवाई लगायी.राजा भी उसकी सेवा में लग गए.जब आदमी होश में आया तो राजा को देखकर चौंक उठा और राजा से क्षमा मांगने लगा.अब राजा ने उसका कारण पूछा तो उसने बताया कि वो राजा को मारने के इरादे से निकला था लेकिन सैनिकों ने उसके मंसूबों को भांप लिया और उसपर हमला कर दिया.वह किसीतरह जान बचाकर भागता हुआ इधर पहुँचा है.महात्माजी के कहने पर राजा ने उसे क्षमा कर दिया.

तब राजा ने महात्मा से प्रश्न किया कि मेरे तीन प्रश्न हैं.सबसे पहला कि उत्तम समय कौन-सा है,सबसे बढ़िया काम कौन-सा है और सबसे अच्छा व्यक्ति कौन है?महात्मा बोले कि हे राजन! इन तीनों प्रश्नों का उत्तर तो तुमने पा लिया है.सबसे उत्तम समय है वर्तमान.आज तुमने वर्तमान समय का सदुपयोग करते हुए मेरा हाथ बँटाया और वापस जाने को टाला जिससे तुम बच गए.वो व्यक्ति बाहर तुम्हारी जान ले सकता था.और जो सामने आ जाए वही सबसे बढ़िया काम है.आज तुम्हारे सामने बगीचे का काम आया और तुम उसमे लग गए.वर्तमान को सँवार कर उसका सदुपयोग किया.इसी कर्म ने तुम्हे दुर्घटना से बचाया.और सबसे बढ़िया व्यक्ति वह है जो प्रत्यक्ष हो.उस आदमी के लिए अपने दिल में सद्भाव लाकर तुमने उसकी सेवा की.इससे उसका ह्रदय परिवर्तित हो गया और तुम्हारे प्रति उसका वैर भाव धुल गया.

इसप्रकार तुम्हारे सामने आया व्यक्ति,शास्त्रानुकूल कार्य और वर्तमान समय उत्तम है.

तो कितनी सुन्दर बात महात्माजी ने राजा को बतायी.आप जो कहते हैं कि हम बुढ़ापे में भक्ति कर लेंगे तो पता नही कि बुढ़ापा आएगा कि नही आयेगा.वर्तमान समय ही सबसे उत्तम है.वर्तमान समय को हाथ से जाने न दीजिए.इसी में भक्ति कीजिये और भगवान रूपी रत्न को प्राप्त कीजिये.
*****************************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और अब बारी है आपके SMS को कार्यक्रम में शामिल करने की.
SMS: मयूर विहार से ममता कहती हैं-A great thinker was asked,what is the meaning of life.He replied -life itself has no meaning.Life is an opportunity to create a meaning.
Reply: अर्थात्
किसी बहुत बड़े दार्शनिक से पूछा गया की जीवन का अर्थ क्या है तो उसने कहा की जीवन का अपने आप में कोई अर्थ नही है.जीवन एक ऐसा अवसर है जिसमे आप एक अर्थ पैदा कर सकते हैं.

बहुत सुन्दर बात कही है आपने.सच में जीवन एक सुअवसर है.
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहु सम्भवान्ते 
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः|(श्रीमद्भागवत,11.9.29)
बताया गया है कि बहुत ही मुश्किल से ये सुदुर्लभ अवसर आपको प्राप्त होता है मनुष्य रूपी जीवन का जिसमे आप अपनी समस्त समस्याओं से सदा-सर्वदा के लिए छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं.बारम्बार जन्म  लेना,बारम्बार मरना,ये सारी जो सब समस्याएं हैं,जीवन के कारण जो समस्याएं हैं सबसे सदा के लिए मुक्ति हो सकती है.यदि आप इसी जीवन में भगवद्भक्ति प्राप्त कर ले तो.

तो वाकई जीवन एक सुनहरा अवसर है.
SMS: सूरजपुर बागपत से अनिल पूछते हैं कि ये बताईये भगवान कहाँ हैं?
Reply: अनिल जी भगवान कहाँ नही हैं?पहले आप मुझे ये तो बता दीजिए.भगवान कहाँ नही हैं?लेकिन भगवान कहते हैं:

मै अपने अव्यक्त रूप से हर जगह व्याप्त हूँ.वैसे ही जैसे सूरज आसमान में व्याप्त है और अपनी किरणों के द्वारा हर जगह पर व्याप्त है.इसीतरह से भगवान अपने लोक में व्याप्त हैं और जिसतरह सूरज अपनी किरण के रूप में हर जगह व्याप्त है,भगवान अपनी शक्ति के रूप  में हर जगह,कण-कण में व्याप्त हैं.कण-कण में,आप में हैं,मुझ में हैं,हर प्राणी में हैं.

तो भगवान हर जगह हैं.लेकिन हर जगह से भगवान को निकाल लेना,हर जगह में भगवान को देख पाना इसके लिए आपको प्रशिक्षण लेना पड़ेगा.आपको Training लेनी पड़ेगी.जब आप किसी व्यक्ति से जो कि तत्वविद हो,तत्व ज्ञानी हो,जो भगवद तत्व को जानता हो,उससे ये प्रशिक्षण लेंगे कि भगवान को कैसे देखा जाए तो मै आपको बताती हूँ कि आप भगवान को समझ पायेंगे और आपको भगवान जगह नजर आयेंगे.
*********************************************
कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम इस समय ले रहे हैं आपके SMS.
SMS: बागपत से दिलीप आर्य लिखते हैं कि ईश्वर पर भरोसा करना सीखना है तो परिंदों से सीखो.जब शाम को घर वापस जाते हैं तो उनके चोंच में कल के लिए कोई दाना नही होता.
Reply: दिलीप जी कितनी सुन्दर बात आपने लिखी है.पक्षी सचमुच इंसान से कितने अलग होते हैं.है न.पक्षियों के लिए यदि आप एक बोरा चावल डाल दे तो वे अपनी चोंच में भरकर उतना ही ले जायेंगे जितना उन्हें जरूरत है.वो कही पर जमा नही करते,जमाखोरी नही करते.वे  ये नही सोचते  कि हम अपना पेट भर लेंगे बरसो और बाकी लोग जाएँ नरक में.हमें क्या लेना-देना.

जबकि इंसान.इंसान तो सोचता है कि एक बोरी चावल क्यों?कही से भी और,और,और अनाज जमा किया जाए.

तो आपने बहुत सुन्दर बात लिखी है.पंछी जब शाम को घर लौटते हैं तो उनकी चोंच में कल के लिए कोई दाना नही होता.लेकिन हम कल के बारे में ही सोचते रहते हैं.आज को बिसरा देते हैं.वर्तमान जो कि सबसे उत्तम समय है.आपने सुना भी.उसे हम बिसरा देते हैं.भूल जाते हैं.उसके बारे में कुछ नही सोचते.बहुत दुःख की बात है.

आपने वाकई बहुत सुंदर बात लिखी है दिलीप जी.
SMS: सुमन सरोजनीनगर से पूछती हैं कि मन को भगवान में कैसे लगाऊं कि भगवान मन की जरूरत बन जाए.
Reply: सुमन जी बहुत सुन्दर प्रश्न है आपका कि मन को भगवान में किस तरह लगाऊं.और आज की चर्चा में बात भी यही रही कि भगवान कहते हैं:
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ 
अगर आप मुझे अपना मन और बुद्धि दे देंगे तो आप असंशय रूप से,बिना किसी शक के मुझे प्राप्त कर सकेंगे.

तो भगवान को आप तभी प्राप्त कर सकते हैं जब आप मन को भगवान में लगाये.लेकिन मन जब तक जगत में लगा रहेगा.जब तक आप इस जगत में सुख ढूंढते रहेंगे तब तक आपका मन भगवान में लगने वाला नही है.ये याद रख लीजिए.जिसदिन आप इस दुनिया के सुखों से बोर हो जायेंगे,उब जायेंगे और आपको इस दुनिया से मिलनेवाले सुख में कोई नवीनता नजर नही आयेगी.जब आपका मन नवीन रस के लिए मचल उठेगा.जब आपका मन ये जानना चाहेगा कि कैसे इस दुनिया के जंजाल से मै छुटकारा पाऊं?क्या करूँ मैं?जब आपको यहाँ का कोई सुख सुखी नही कर पायेगा तभी आपका मन भगवान के चरणों में जाएगा.

तो आप देखिये कि वो समय कब आता है आपके जीवन में.लेकिन फिर भी आप इतना तो कर ही सकते हैं कि आप भगवान का नाम लेते रहिये.भगवान का नाम लेते रहने से आपका मन शुद्ध हो जाएगा और आपका मन भगवान में लगेगा.
                         -------------------XXXXXXXXX---------------------